Thursday, February 12, 2026

ऑपरेशन कालनेमि में 121 फर्जी मौलाना चढ़े उत्तराखंड पुलिस के हत्थे, भगवा पहन करते थे ठगी

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में पुलिस ने ऑपरेशन कालनेमि के अंतर्गत एक और फर्जी धर्मगुरु को गिरफ्तार किया है।

बुधवार, 16 जुलाई 2025 को मोहम्मद याकूब नामक व्यक्ति को पकड़ा गया, जो खुद को मौलाना बताकर लोगों को धोखे में रखता था।

मोहम्मद याकूब के साथ-साथ पुलिस ने सात अन्य लोगों को भी हिरासत में लिया है। ये सभी पाखंडी धार्मिक भेष धारण कर लोगों को गुमराह करते थे और उनसे धन वसूलते थे। पुलिस को इनके विरुद्ध शिकायतें प्राप्त हुई थीं, जिनके आधार पर छापेमारी की गई।

फर्जी मौलाना मदरसे के नाम पर करता था चंदा वसूली, अन्य आरोपी बने थे नकली साधु

गिरफ्तार किया गया मोहम्मद याकूब कथित तौर पर मदरसे के नाम पर चंदा वसूलकर लोगों को बहकाता था। पुलिस की जांच में सामने आया कि वह एक संगठित ढंग से लोगों को ठगने का काम करता था।

अन्य सात आरोपी हिन्दू साधु-संतों की तरह भेष बना कर ठगी कर रहे थे। ये सभी समाज में भ्रम फैलाकर भोले-भाले लोगों से पैसे ऐंठने में लिप्त थे। पुलिस ने इनके कब्जे से संदिग्ध सामग्री भी जब्त की है।

9 जुलाई से जारी है ऑपरेशन कालनेमि, अब तक 121 ढोंगियों पर गिरी गाज

देहरादून एसएसपी अजय सिंह के अनुसार, ऑपरेशन कालनेमि की शुरुआत 9 जुलाई 2025 को हुई थी। तब से लेकर अब तक कुल 121 फर्जी साधु-संतों पर कानूनी कार्रवाई की जा चुकी है।

इससे पहले मोहम्मद सलीम, मोहम्मद जाफर और हसन शाबिर जैसे लोग भी फर्जी साधु के भेष में पकड़े जा चुके हैं। यह अभियान राज्यभर में चलाया जा रहा है, जिसमें सभी जिलों की पुलिस सक्रिय है।

मुख्यमंत्री धामी की पहल पर चल रहा विशेष अभियान, फर्जी बाबाओं की अब खैर नहीं

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्वयं इस अभियान की रूपरेखा तय की थी। राज्य में बढ़ते फर्जी बाबाओं और ढोंगियों के नेटवर्क पर नकेल कसने के उद्देश्य से ऑपरेशन कालनेमि शुरू किया गया।

सीएम धामी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जो लोग धार्मिक पहचान का झूठा दिखावा करके जनता को ठगते हैं, उनके खिलाफ कठोरतम कार्रवाई की जाए। इसी क्रम में लगातार गिरफ्तारियाँ हो रही हैं और पुलिस हर शिकायत को गंभीरता से ले रही है।

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Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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