न्यूक्लियर डील पर बढ़ी सख्ती: ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रहे परमाणु विवाद को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है।
हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच नई बातचीत शुरू होने की संभावना है।
माना जा रहा है कि यह वार्ता ओमान की राजधानी मस्कट में हो सकती है। इस संभावित बैठक को वैश्विक राजनीति और पश्चिम एशिया की स्थिरता के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस वार्ता को लेकर काफी उत्सुक नजर आ रहा है क्योंकि इससे लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की उम्मीद जताई जा रही है।
ईरान ने बातचीत को लेकर रखा अपना पक्ष
न्यूक्लियर डील पर बढ़ी सख्ती: ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा कि इस बार ईरान पिछले एक साल के घटनाक्रम और अनुभवों को ध्यान में रखते हुए बातचीत करेगा।
उन्होंने साफ तौर पर कहा कि ईरान किसी भी वार्ता में अपने अधिकारों और राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा।
अराघची ने जोर देते हुए कहा कि किसी भी स्थायी समझौते के लिए दोनों देशों को अपने वादों को निभाना जरूरी होगा।
उन्होंने बराबरी का दर्जा, आपसी सम्मान और पारदर्शिता को किसी भी मजबूत और टिकाऊ समझौते की बुनियादी शर्त बताया।
उनका बयान इस बात की ओर संकेत करता है कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है लेकिन वह अपने रुख पर मजबूती से कायम रहेगा।
इजरायल-ईरान संघर्ष के बाद बढ़ा तनाव
जून 2025 में इजरायल और ईरान के बीच लगभग 12 दिनों तक चले सैन्य संघर्ष ने पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया था।
इस संघर्ष के दौरान हालात इतने गंभीर हो गए थे कि अमेरिका ने भी ईरान के परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले किए थे।
इन घटनाओं के बाद ईरान और अमेरिका के रिश्ते और अधिक तनावपूर्ण हो गए थे। इसके साथ ही ईरान के भीतर भी विरोध प्रदर्शन देखने को मिले, जिन पर सरकार ने सख्ती दिखाई।
इन परिस्थितियों ने परमाणु वार्ता को लगभग ठप कर दिया था, लेकिन अब फिर से बातचीत की संभावना बनने से कूटनीतिक हल निकालने की उम्मीद बढ़ गई है।
परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंध बना मुख्य मुद्दा
ईरान का स्पष्ट कहना है कि बातचीत केवल उसके परमाणु कार्यक्रम और उस पर लगाए गए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों तक ही सीमित रहनी चाहिए।
ईरान का दावा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध उसके विकास और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
दूसरी ओर अमेरिका चाहता है कि वार्ता में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और पश्चिम एशिया में उसकी क्षेत्रीय गतिविधियों को भी शामिल किया जाए।
यही मतभेद दोनों देशों के बीच समझौते की राह में सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
अमेरिका ने बढ़ाई सैन्य मौजूदगी
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिका ने पश्चिम एशिया क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है। अमेरिकी सेना की बढ़ती गतिविधियों को ईरान दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देख रहा है।
हालांकि, इससे पहले दोनों देशों के बीच कई बार परोक्ष यानी अप्रत्यक्ष बातचीत हो चुकी है। अब आमने-सामने बातचीत की संभावना को सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह वार्ता सफल रहती है तो क्षेत्र में शांति स्थापित करने में मदद मिल सकती है।
वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार पर असर
ईरान और अमेरिका के बीच होने वाली संभावित बातचीत का असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस वार्ता पर बारीकी से नजर रखे हुए है क्योंकि इसका सीधा प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार और परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के प्रयासों पर पड़ सकता है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को चेतावनी दी है।
ऐसे में आने वाले समय में मस्कट में होने वाली संभावित वार्ता दोनों देशों के रिश्तों के साथ-साथ वैश्विक राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दे सकती है।

