वेनेजुएला
क्या दुनिया सचमुच नैतिकता से चलती है या ताकत की कुर्सी से। क्या जिन पुरस्कारों को हम सभ्यता का मुकुट समझते हैं वे असल में गुलामी की माला हैं। और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या भारत अब उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसके भीतर ही एक ऐसा मोहरा तैयार किया जा रहा है जो बाहर की शक्तियों का काम भीतर से पूरा कर दे।
मैं इस भ्रम में नहीं रहता कि वैश्विक राजनीति किसी आदर्शवाद की पाठशाला है। यहाँ आदर्श एक मुखौटा है और सत्ता एक कारखाना। जो लोग किसी विदेशी नेता की एक प्रशंसा पर भावुक होकर तालियाँ बजाने लगते हैं, वे नहीं समझते कि प्रशंसा अक्सर प्यार नहीं होती, वह रस्सी का पहला फंदा होती है। वेनेजुएला की विपक्षी नेता माचाडो ने जब मोदीजी की प्रशंसा की तो कुछ लोग उत्साह में ऐसे उछले मानो दुनिया ने भारत को स्वर्ण मुकुट पहना दिया हो। मुझे इसमें कोई सम्मान नहीं दिखता। मुझे इसमें एक संकेत दिखता है। संकेत यह कि अंतरराष्ट्रीय खेल में भारत को भी किसी भूमिका में फिट करने की कोशिशें चलती रहती हैं और उस भूमिका के लिए भारत के भीतर कौन उपयोगी होगा, यह चयन भी उसी खेल का हिस्सा होता है।
पुरस्कारों का तंत्र और अंतरराष्ट्रीय गिरोह
नोबेल पुरस्कार याद कीजिए। मैगसेसे याद कीजिए। इन्हें मानवता का प्रमाणपत्र मानने की आदत ने लोगों का विवेक कुंद कर दिया है। मैं इन्हें नैतिकता का मंच नहीं मानता। मैं इन्हें पश्चिमी डीप स्टेट के उपकरण मानता हूँ, एक ऐसा तंत्र जो विश्व राजनीति में अपने हित साधने के लिए चमकदार तमगे उछालता है, मीडिया का शोर खड़ा करता है, और फिर राष्ट्रों की गर्दन पर दबाव का घुटना रख देता है। यह कोई सभ्य सभा नहीं, एक संगठित गिरोह है, अंतरराष्ट्रीय गुंडों का गिरोह, जो सभ्यता के शब्दों से अपनी साजिशों पर सुगंध छिड़कता है।
पुरस्कार का काम सम्मान देना नहीं होता, पुरस्कार का काम मनोवैज्ञानिक बंधक बनाना होता है। पहले किसी को महान घोषित करो। फिर उस महानता को उसके सिर पर ताज नहीं, जंजीर बना दो। जब तक वह आदेश मानता है, वह महान कहलाता है। जिस दिन वह स्वतंत्र होने की कोशिश करता है, उसी महानता के नीचे उसे कुचल दिया जाता है। यही पैटर्न है। यही तरीका है। यही खेल है।
झेलेन्सकी का मॉडल और युद्ध का कारोबार
यूक्रेन का अध्याय किसी करुण कथा से अधिक एक कारोबार की कथा है। हथियार लॉबी युद्ध से खुश है, वह खुशी किसी देश के दुख से नहीं, बिक्री से पैदा होती है। युद्ध जितना लंबा चलेगा, उतना मुनाफा। युद्ध के बाद जो पुनर्निर्माण होगा, वह भी मुनाफे का दूसरा संस्करण है। और उसके बाद जो संसाधनों की लूट होगी, वह तीसरा चरण है। इसीलिए युद्ध केवल सीमाओं का नहीं होता, वह खनिजों का होता है, पाइपलाइनों का होता है, माइनिंग लाइसेंसों का होता है, ठेकों का होता है, और अंततः वैश्विक नियंत्रण का होता है।
झेलेन्सकी को जिस तरह चमकाया गया, वह कोई सहज प्रक्रिया नहीं थी। वह एक परियोजना थी। उसे नायक बनाकर पेश करना, उसे वैश्विक मंच देना, उसके लिए भावनात्मक कथाएँ गढ़ना, यह सब उसी मशीन का हिस्सा था जो दुनिया को नियंत्रित करती है। और यह भी साफ है कि यदि वह जल्दी युद्ध न छेड़ता, यदि वह उस आग में तुरंत घी न डालता, तो उसे शांति का तमगा भी थमाया जा सकता था। पुरस्कार का चारा उसके सामने होता और उसे उसी रस्सी से बाँध दिया जाता। लेकिन कई बार जाल बिना चारे के भी कस दिया जाता है, क्योंकि मोहरा पहले ही तैयार कर लिया जाता है।
ब्लैकमेल की राजनीति और एपस्टीन प्रकरण का संकेत
दुनिया को चलाने का सबसे सस्ता तरीका यह है कि लोगों को उनके ही अपराधों से बाँध दिया जाए। नैतिकता का उपदेश देने वाले अक्सर सबसे आसान शिकार होते हैं, क्योंकि उनके पास छिपाने को बहुत कुछ होता है। पश्चिमी सत्ता तंत्र का सबसे घिनौना हथियार यही है, फाइलें, वीडियो, दस्तावेज, रिश्ते, और गुप्त समझौते। और जब किसी के पास छिपाने लायक सामग्री हो जाती है, तब वह नेता नहीं रहता, वह बंधक बन जाता है।
एपस्टीन प्रकरण में जो बातें सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनीं, जो नाम दुनिया भर में उछाले गए, और जिन संकेतों पर बहस हुई, वे इस बात का उदाहरण हैं कि कैसे सत्ता किसी व्यक्ति को उसकी कमजोरियों से पकड़कर अपनी मुट्ठी में कर लेती है। मैं किसी अदालत की भाषा नहीं लिख रहा, मैं राजनीति की भाषा लिख रहा हूँ। राजनीति में प्रमाण का अर्थ केवल न्यायालय नहीं होता, राजनीति में प्रमाण का अर्थ दबाव की सामग्री होता है। जिस क्षण किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसी सामग्री मौजूद हो जाती है जिसे लीक किया जा सकता है, उसे घुमाकर बदनाम किया जा सकता है, उसे उसके परिवार और भविष्य के खिलाफ हथियार बनाया जा सकता है, उसी क्षण वह व्यक्ति उस गिरोह का आजीवन कैदी बन जाता है। यह कैद लोहे की सलाखों में नहीं होती, यह कैद मंचों पर होती है, कैमरों के सामने होती है, और तालियों की आवाज में होती है।
वैनेजुएला का तेल और रूस पर आर्थिक दबाव
रूस यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में असली लड़ाई बंदूकों की नहीं, अर्थव्यवस्था की भी है। युद्ध के मैदान में जो जीतता है, उसे बाजार में भी जीत चाहिए। और बाजार में जीत का अर्थ ऊर्जा पर नियंत्रण है। तेल की कीमतें केवल पेट्रोल पंप की कहानी नहीं, यह देशों की नीतियों की रीढ़ होती हैं। जब किसी देश की अर्थव्यवस्था ऊर्जा निर्यात पर निर्भर हो, तो तेल की कीमतें गिराकर उसे कमजोर करना सबसे प्रभावी हथियार बन जाता है।
इसीलिए वैनेजुएला का तेल इस खेल में एक दबाव बटन है। सस्ता तेल केवल उपभोक्ता को राहत नहीं देता, वह कुछ अर्थव्यवस्थाओं की कमर तोड़ देता है। जब लक्ष्य यह हो कि रूस को कमजोर किया जाए, उसे घुटनों पर लाया जाए, और उसे युद्ध रोकने या शर्तें बदलने पर मजबूर किया जाए, तब तेल की कीमतें एक छुपा हुआ तोपखाना बन जाती हैं। और युद्ध के बाद अमेरिकी माइनिंग माफिया के लिए अवसरों की जो गंध आती है, वह यूक्रेन के खनिज इलाकों से आती है। यही कारण है कि खनिज क्षेत्र केवल नक्शे पर रंग नहीं, भविष्य के ठेके होते हैं। इसलिए दबाव बनाया जाता है। इसलिए सस्ती ऊर्जा के कार्ड खेले जाते हैं। इसलिए वैनेजुएला जैसे मोर्चे अचानक सक्रिय हो जाते हैं।
बांग्लादेश और पूर्वोत्तर का भूगोल
दक्षिण एशिया का नक्शा केवल देशों की सीमाएँ नहीं, वह निगरानी के कोण हैं। बांग्लादेश और भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र उस बड़े उद्देश्य के लिए उपयोगी है जिसमें चीन पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर जमीन से दूसरा मोर्चा खोलना शामिल है। हवा और समुद्र से निगरानी अलग बात है, जमीन से दबाव अलग बात है। जमीन के लिए जमीन चाहिए, ठिकाने चाहिए, सहायक सरकारें चाहिए, और ऐसी राजनीतिक परिस्थितियाँ चाहिए जिनमें स्थानीय प्रतिरोध को या तो कुचला जा सके या भ्रमित किया जा सके।
शेख हसीना ने जब अमेरिकी बेस के लिए द्वीप देने से इनकार किया, तो उसके बाद जो राजनीतिक तापमान बढ़ा, जो आंदोलनों का नैरेटिव बना, जो नैतिकता की आड़ में सत्ता परिवर्तन का वातावरण तैयार हुआ, वह मुझे किसी स्वाभाविक लोकतांत्रिक घटना की तरह नहीं दिखता। मुझे यह एक सुनियोजित ऑपरेशन जैसा दिखता है। छात्र आंदोलन जैसी ऊर्जा को हाइजैक करना बहुत आसान होता है, क्योंकि युवा का गुस्सा ईमानदार होता है और उसी ईमानदारी का इस्तेमाल सबसे आसानी से किया जा सकता है। फिर एक ऐसा चेहरा आगे कर दिया जाता है जो बाहर से शांत, सज्जन, सम्मानित दिखे, ताकि असली खेल पर पर्दा पड़ जाए। मुहम्मद युनुस की ओट में यह पर्दा तैयार किया गया, यही मेरा निष्कर्ष है।
अब भारत की बारी और भीतर का एजेंट
जो लोग अभी भी सोचते हैं कि भारत इस खेल से बाहर है, वे सबसे बड़े भ्रम में हैं। भारत का आकार बड़ा है, उसकी संस्कृति गहरी है, उसकी जनसंख्या विशाल है, उसका भूगोल निर्णायक है, और यही कारण है कि भारत को नियंत्रित करना सबसे बड़ा लक्ष्य है। जब किसी देश को सीधे युद्ध से नहीं तोड़ा जा सकता, उसे भीतर से तोड़ा जाता है। जब सीमा पर दबाव पर्याप्त नहीं होता, राजनीति पर दबाव बनाया जाता है। और जब राजनीति पर दबाव भी जोखिम भरा हो, तो सत्ता में ऐसा चेहरा बैठाने की कोशिश होती है जो दबाव को आदेश समझकर लागू कर दे।
यहाँ सवाल केवल इतना है कि भारत में डीप स्टेट का एजेंट कौन है। मैं इसे घुमा कर नहीं लिखूँगा। मेरे सामने जो चित्र बनता है, उसमें यह भूमिका राहुल गांधी के हिस्से आती है। वह केवल एक विपक्षी नेता नहीं, वह एक परियोजना है। वह एक ऐसा मोहरा है जिसे भारत की सत्ता तक पहुँचाकर भारत के निर्णयों को बाहर की इच्छाओं के अनुरूप मोड़ा जा सकता है।
राहुल गांधी की सत्ता और भारत की नीलामी
यदि राहुल गांधी को सत्ता मिल गई, तो यह केवल सरकार बदलने की घटना नहीं होगी। यह भारत की दिशा बदलने का क्षण होगा। भारत की संप्रभुता, भारत की सामरिक नीति, भारत की सांस्कृतिक अस्मिता, और विशेषकर हिंदू समाज की सुरक्षा, सब कुछ दांव पर लग जाएगा। मैं इसे सामान्य राजनीतिक आलोचना नहीं मानता। मैं इसे अस्तित्व का प्रश्न मानता हूँ।
राहुल गांधी को सत्ता मिलते ही भारत के भीतर वह प्रक्रिया तेज होगी जिसमें हिंदू समाज को अपराधबोध में धकेला जाता है, उसकी परंपराओं को कटघरे में खड़ा किया जाता है, उसकी आवाज को उग्र कहकर दबाया जाता है, और उसके विरोध को असहिष्णुता का नाम देकर अपराध बना दिया जाता है। यह वही मॉडल है जो पहले कई देशों में आजमाया गया। पहले संस्कृति को बदनाम करो, फिर उसे संरक्षण की जरूरत दिखाओ, फिर संरक्षण के नाम पर नियंत्रण स्थापित करो। यही क्रम है।
और इस क्रम में सबसे घातक गठजोड़ वह होगा जिसमें भारत को अमेरिका के हितों और इस्लामिक जेहादियों के एजेंडे के बीच एक समझौते की वस्तु बना दिया जाएगा। भारत को सौदा बनाया जाएगा। हिंदुओं को बाधा बताया जाएगा। राष्ट्रीय सुरक्षा को उग्रता कहा जाएगा। और जो भी प्रतिरोध करेगा, उसे लोकतंत्र का दुश्मन घोषित किया जाएगा।
नोबेल शांति पुरस्कार की तैयारी
मुझे इसमें भी कोई संदेह नहीं कि अगले साल तक राहुल गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार जैसा तमगा दिया जा सकता है। यह तमगा उसकी शांति के लिए नहीं होगा, यह तमगा उस सेवा के लिए होगा जो वह भारत को भीतर से कमजोर करके देगा। पुरस्कारों की मशीन ऐसे ही काम करती है। पहले लक्ष्य निर्धारित होता है, फिर लक्ष्य के अनुसार चेहरा चमकाया जाता है, फिर उस चेहरे को नैतिकता का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, और अंततः उसी प्रतीक के सहारे राष्ट्र की रीढ़ तोड़ी जाती है।
इसलिए मैं राहुल गांधी को चौथा झेलेन्सकी कहता हूँ। चौथा युनुस कहता हूँ। क्योंकि उसका काम भी वही होगा, सत्ता के भीतर बैठकर बाहर के एजेंडे को वैधता देना। बाहर के दबाव को नीति बनाना। और देश के प्रतिरोध को अपराध बना देना।
गिरफ्तारी का शोर और सहानुभूति का जाल
यह भी साफ है कि चाहे कितने भी ठोस कारण हों, जैसे ही सरकार कार्रवाई करेगी, जैसे ही गिरफ्तारी या कठोर कदम की बात आएगी, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा शोर मचाएगा। शोर का मकसद न्याय नहीं होगा, शोर का मकसद भ्रम होगा। कैमरे चीखेंगे, पैनल गरजेंगे, लेखों में रोना लिखा जाएगा, और माहौल ऐसा बनाया जाएगा मानो देश में कोई अपराधी नहीं पकड़ा गया, बल्कि लोकतंत्र पर हमला हो गया।
और इससे भी बड़ी समस्या हिंदू समाज का वह वर्ग है जो तुरंत भावुक हो जाता है। जिसे राजनीतिक रणनीति नहीं दिखती, सिर्फ चेहरा दिखता है। जो परिवारवादी सहानुभूति में उलझ जाता है। जो यह भूल जाता है कि सत्ता के खेल में सहानुभूति अक्सर जाल होती है। इसी सहानुभूति का उपयोग करके धूर्तता को पीड़ित बना दिया जाता है और राष्ट्र को अपराधी।
यह वही क्षण होता है जब समाज का धैर्य टूटता है और गिरोह मजबूत होता है। यह वही क्षण होता है जब सच्चाई का गला भावनाओं से दबा दिया जाता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि अगर किसी भी स्तर पर कार्रवाई की जरूरत पड़े, तो समाज को शोर से नहीं बहना चाहिए। उसे पहचानना चाहिए कि शोर का मालिक कौन है और शोर का लाभ किसे मिल रहा है।
एकमात्र उपाय, सत्ता से दूर रखना
मेरे लिए समाधान बहुत स्पष्ट है। राहुल गांधी और कांग्रेसी सोच को सत्ता से दूर रखना ही राष्ट्रीय सुरक्षा की पहली शर्त है। यह कोई चुनावी नारा नहीं, यह आत्मरक्षा की नीति है। जो सोच भारत को कमजोर करती है, जो सोच बाहरी दबावों को स्वीकार्य बनाती है, जो सोच हिंदुओं को अपराधी ठहराती है, जो सोच राष्ट्रवाद को उग्रता कहकर बदनाम करती है, उसे सत्ता से बाहर रखना ही देश का बचाव है।
यह बचाव भावनात्मक भाषणों से नहीं होगा। यह बचाव स्पष्ट दृष्टि से होगा। यह बचाव सामाजिक एकजुटता से होगा। यह बचाव ऐसे नागरिक विवेक से होगा जो जाति के चश्मे से नहीं देखता, क्षेत्र के मोह से नहीं सोचता, और मीडिया के शोर से नहीं डरता। जब समाज किसी चेहरे की चमक में नहीं, उसके पीछे की रस्सियों में रुचि लेता है, तब षड्यंत्र विफल होते हैं।
मैं जाति के चक्कर को सबसे बड़ा भ्रम मानता हूँ, क्योंकि यही वह विभाजन है जिसे बाहर की शक्तियाँ सबसे पहले भुनाती हैं। विभाजित समाज सस्ता पड़ता है। लड़ता समाज नियंत्रित करना आसान होता है। और यही कारण है कि हर बड़े ऑपरेशन की शुरुआत समाज को भीतर से बांटने से होती है। भारत में अगर कोई एकता सबसे जरूरी है, तो वह सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता है, जो हिंदू समाज के आत्मविश्वास से निकलती है, अपराधबोध से नहीं।
दुनिया पुरस्कारों से नहीं चलती, दुनिया दबाव से चलती है। और दबाव का सबसे चमकदार रूप पुरस्कार है। झेलेन्सकी एक अध्याय था, युनुस एक संकेत था, और अब चौथा चेहरा तैयार किया जा रहा है। वह चेहरा हमारे अपने घर के अंदर खड़ा है। वह चेहरा मंचों पर मुस्कराता है, परदे के पीछे बंधक बनकर सौदे करता है। वह चेहरा देश को दिशा नहीं देगा, वह देश को सौंप देगा।
अब फैसला किसी नेता का नहीं, समाज का है। क्या हम पुरस्कारों की चमक से सम्मोहित होकर अपने ही भविष्य पर हस्ताक्षर कर देंगे या समय रहते पहचान लेंगे कि यह चमक नहीं, जाल का फंदा है। क्या हम चौथे चेहरे को पहचानेंगे या फिर उसी को अपना भाग्य लिखने देंगे।

