Tuesday, January 13, 2026

राष्ट्रगीत का धर्म और वंदे मातरम्, अमेरिका, ब्रिटेन, रूस सबके राष्ट्रगीत हैं सांप्रदायिक

जब देश की संसद और अदालत में सेकुलरिज्म की बहस चलती है तो एक बुनियादी सवाल सामने आता है कि राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत का धर्म क्या होता है। क्या राष्ट्रगान केवल राजनीतिक कागज पर लिखे गए सेकुलरिज्म से बंधा होता है, या वह उस समाज की असली सांस्कृतिक आत्मा से जन्म लेता है।

पश्चिमी लोकतंत्र अपने आपको सेकुलर कहते हुए भी अपने राष्ट्रगान में पूरे आत्मविश्वास के साथ क्रिश्चियन god से प्रार्थना करते हैं, और वहां की अल्पसंख्यक आबादी इसे सहज भाव से स्वीकार करती है।

दूसरी तरफ भारत है, जहाँ वन्दे मातरम के दो अंतरे काट कर रख दिए गए, फिर भी मजहबी राजनीति को संतोष नहीं हुआ।

इन दो ध्रुवों के बीच तुलना यह बताती है कि किन देशों ने अपने सांस्कृतिक बहुमत पर भरोसा किया और किस देश ने खुद अपनी जड़ों पर कैंची चला दी।

अमेरिका का राष्ट्रगीत और सांस्कृतिक क्रिश्चियन थिओलोजी

पहली बार तो राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत जैसा विभाजन किसी देश में नहीं है। भारत में वन्दे मातरम् को दबाने के लिए ही ये दो अलग अलग शब्द ईजाद किए गए हैं। सब देशों में राष्ट्रगीत ही होता है।

अमेरिका का राष्ट्रगीत कहलाता है “The Star-Spangled Banner”। यह कोई सूखा औपचारिक गीत नहीं, बल्कि उस देश की सांस्कृतिक क्रिश्चियन थिओलोजी से प्रेरित रचना है। इसकी अंतिम पंक्तियाँ साफ साफ क्रिश्चियन god से प्रार्थना करती हैं

“And this be our motto: “In God is our trust.”
And the star-spangled banner in triumph shall wave
O’er the land of the free and the home of the brave.”

“और यह हमारा आदर्श है: ‘गॉड में हमारा विश्वास है।’
और विजयी ‘सितारों-से-सजा झंडा’ लहराएगा
स्वतंत्र लोगों की भूमि पर और बहादुरों के घर पर।”

यहाँ god शब्द किसी दार्शनिक, निराकार सार्वभौमिक सत्ता के लिए नहीं, सीधे सीधे क्रिश्चियन ईश्वर के लिए प्रयुक्त है, यह बात अमेरिकी सांस्कृतिक संदर्भ में किसी से छिपी नहीं।

यही भाव आगे चलकर राष्ट्रवाक्य में उतरता है, “In God We Trust”। अमेरिकी डॉलर पर यही वाक्य छपा है, अदालतों और सार्वजनिक भवनों में यही वाक्य लिखा है।

अमेरिका संविधान की भाषा में एक सेकुलर देश है, वहाँ कोई राज्य धर्म नहीं है। लेकिन इस सेकुलर व्यवस्था ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों, अपने बहुसंख्यक क्रिश्चियन चरित्र और वहां की इतिहासपरक स्मृतियों से समझौता नहीं किया।

वहाँ के मुसलमान इस बात का विरोध नहीं करते कि राष्ट्रगीत में क्रिश्चियन God से प्रार्थना है। न वहाँ की पार्टियाँ और न सरकारें इस डर से झुकती हैं कि कहीं किसी की धार्मिक भावनाएँ आहत न हो जाएँ, इसलिए अपने राष्ट्रीय प्रतीकों से क्रिश्चियन चिह्नों को काट फेंके जाएँ।

यानी संविधान के स्तर पर सेकुलर, संस्कृति के स्तर पर आत्मविश्वासी क्रिश्चियन बहुल समाज, और दोनों के बीच कोई अंतर्विरोध की लंबी रोती हुई कहानी नहीं।

सवाल सीधा है, वही God शब्द भारत के हिन्दू देवताओं के लिए सुनाई देता है तो सिर्फ यहाँ के वामपंथी और नकली सेकुलर तबकों को अचानक धर्मनिरपेक्षता याद क्यों आ जाती है।

ब्रिटेन का राष्ट्रगीत, राजा के लिए प्रार्थना और जेरुसलम गीत

ब्रिटेन का कोई विधिवत लिखित राष्ट्रगीत नहीं है, पर व्यावहारिक रूप से “God Save the King” ही राष्ट्रगीत की तरह माना जाता है। इस पूरे गीत में क्रिश्चियन god से एक ही प्रार्थना है – ब्रिटिश राजा या रानी की सलामती, दीर्घायु, और शासन की स्थिरता। पूरा गीत इस भावना पर टिका है कि

god save our gracious King
long live our noble King
god save the King

और आगे सीधी सी पंक्ति आती है
“Long to reign over us, God save the King.”

यानि खुला निवेदन कि यह राजा हम पर लंबे समय तक राज करे, god उसे हमारे ऊपर शासन करने के लिए सुरक्षित रखे। यह आधुनिक लोकतंत्र है, फिर भी राष्ट्रगीत किसी अमूर्त “we the people” के लिए नहीं, सीधे सीधे सिंहासन पर बैठे व्यक्ति के लिए god की कृपा माँगता है।

इसी ब्रिटिश सांस्कृतिक परंपरा में दूसरा प्रसिद्ध देशभक्ति गीत “Jerusalem” है, जिसे इंग्लैंड की क्रिकेट, रग्बी और कॉमनवेल्थ टीमें पूरे गर्व के साथ बजाती हैं।

यह गीत तो पूरी तरह क्रिश्चियन मिथकीय कल्पना पर आधारित है, जिसमें यह विचार आता है कि कहीं ईसा मसीह ने ब्रिटेन की धरती पर कदम रखा होगा, और अंत में कामना की जाती है कि इंग्लैंड ही एक प्रकार का नया जेरुसलम बन जाए

I will not cease from Mental Fight,
Nor shall my Sword sleep in my hand
Till we have built Jerusalem
In Englands green & pleasant Land.

“मैं मानसिक संघर्ष से पीछे नहीं हटूंगा, और न ही मेरी तलवार मेरे हाथ में सोएगी: जब तक हम जेरूसलम का निर्माण नहीं कर देते, इंग्लैंड की हरी-भरी और सुखद भूमि में।”

यहाँ जेरुसलम कोई भूगोल नहीं, क्रिश्चियन पवित्र नगर का प्रतीक है, जिसे अब इंग्लैंड की भूमि पर आदर्श रूप में खड़ा करने की बात कही जा रही है। इसे अगर भारतीय संदर्भ की शब्दावली में कहें तो यह अत्यंत “साम्प्रदायिक” राष्ट्रगीत है, जो सीधे एक विशेष मजहबी मिथक को राष्ट्रीय आकांक्षा से जोड़ देता है।

फिर भी न ब्रिटिश संसद इस पर बहस करती है, न वहाँ का कथित प्रगतिशील समाज रोना रोता है कि यह अल्पसंख्यकों के खिलाफ है, न कोई अदालत इस गीत की पंक्तियाँ काटने बैठती है। कारण साफ है, राष्ट्र की सांस्कृतिक majority को अपने प्रतीकों में अपना चेहरा दिखने पर अपराधबोध नहीं होता।

रूस का राष्ट्रगीत और God द्वारा संरक्षित मातृभूमि

सोवियत संघ के नास्तिक कम्युनिस्ट दौर के बाद रूस ने अपना नया राष्ट्रगीत बनाया। इस राष्ट्रगीत में भी क्रिश्चियन God से प्रार्थना की गई है। मूल रूसी में इसके तीसरे पैरा का भाव है

“You are the only one in the world! You are the only one – the native land so kept by God!”

तुम दुनिया में अद्वितीय हो। तुम ही वह जन्मभूमि हो जिसे god ने विशेष रूप से सुरक्षित रखा है।

यहाँ भी वही बात साफ है, राष्ट्र को कोई अनाम शक्ति नहीं, god स्वयं सुरक्षित रख रहा है। यह god, रूसी ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चियन परंपरा की धार्मिक भाषा के भीतर समझा जाता है।

इस पूरे यूरोपीय खंड में, चाहे ब्रिटेन हो, अमेरिका हो, या रूस, कहीं भी राष्ट्रगान में अल्लाह का नाम नहीं आता, सभी में क्रिश्चियन god की भाषा ही प्रयुक्त है।

फिर भी इन्हें “थियोक्रेटिक स्टेट” कहकर खारिज नहीं किया जाता, न संयुक्त राष्ट्र में इनके secular credentials पर सवाल उठते हैं।

पश्चिम में राष्ट्रगान बदलने की परंपरा और भारत की जड़ता

इन देशों में राष्ट्रगीत समय समय पर बदले भी गए हैं। फ्रांस का मार्सेलीज़ हो या रूस के सोवियत काल से लेकर वर्तमान तक के बदलाव हों, किसी समाज ने यह नहीं माना कि एक बार जो राष्ट्रगीत तय हो गया वह सदा के लिए पत्थर की लकीर बन गया। इतिहास में सत्ता बदली, विचार बदले, राष्ट्रीय आकांक्षा बदली, तो प्रतीक भी बदले।

समस्या यह नहीं कि भारत में राष्ट्रगीत बदला नहीं जा सकता, असल समस्या यह है कि यहाँ निर्णय प्रक्रिया के ऊपर एक बौद्धिक आतंक छाया हुआ है, “एक बार जो कर दिया, अब बदलोगे तो communal कहलाओगे।”

यह जड़ मानसिकता उसी शिक्षा व्यवस्था की देन है जो मैकॉले की रेखा पर चलकर हिन्दू बहुसंख्यक की सांस्कृतिक स्मृति को हीनभावना का पर्याय बना चुकी है।

वन्दे मातरम्, जिन्ना की राजनीति और भारतीय सेकुलरिज्म की ब्लैकमेल

भारत का मामला अलग है। यहाँ राष्ट्रगीत वन्दे मातरम का इतिहास ही बताता है कि कैसे सांस्कृतिक आत्मविश्वास को कदम दर कदम काटा गया। वन्दे मातरम का पूरा गीत, उसके छह के छह अंतरे, केवल एक कविता नहीं, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा थे।

“भारत माता” की कल्पना, देवी रूप में नहीं, मातृभूमि रूप में थी, जो बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन से लेकर क्रांतिकारी संगठनों तक का battle cry बनी।

लेकिन 1937 आते आते मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना ने इसे “मजहबी” प्रश्न बना दिया। यह कहा गया कि वन्दे मातरम के कुछ हिस्से इस्लामी एकेश्वरवाद के खिलाफ हैं, इसलिए मुसलमानों को आपत्ति है।

उस दबाव में कांग्रेस नेतृत्व ने पहले तो पूरा गीत ही हाशिये पर डाला, बाद में समझौते के तौर पर सिर्फ दो अंतरे आधिकारिक रूप से स्वीकार किए गए, बाकी चार को काट दिया गया।

दलील यही दी गई कि “कहीं मजहबी नाराज न हो जाएँ।” नतीजा क्या निकला। इस तुष्टीकरण के बाद भी 1947 में विभाजन रुक नहीं सका। पाकिस्तान बना, खून की नदियाँ बहीं, लेकिन विभाजन से पहले शुरू हुई आत्मसमर्पण की आदत भारत के सत्ता वर्ग में जम गई।

स्वतंत्रता के बाद भी वन्दे मातरम का वही काट छांट वाला रूप आगे बढ़ा, और विडम्बना देखिए कि जिस मजहबी दबाव के नाम पर गीत को कुतरा गया, वही मजहब आज भी अक्सर उन दो पैराग्राफ को गाने से भी इंकार कर देता है। कई मौकों पर हमने देखा कि सरकारी समारोहों में भी कुछ प्रतिनिधि वन्दे मातरम के प्रति असहजता जता देते हैं।

तो प्रश्न वही है, उस कांट छांट से सेकुलर नेताओं को क्या मिला। न राजनीतिक समाधान मिला, न सांप्रदायिक सद्भाव बना, केवल यह संदेश गया कि इस देश का बहुसंख्यक अपनी ही सांस्कृतिक विरासत पर गर्व नहीं कर सकता, उसे हमेशा apologetic रहना है। यह काम किसी विदेशी उपनिवेशक ने नहीं, हीनभावना से ग्रसित मैकॉलेवादी सेकुलरों ने किया।

श्रीलंका का राष्ट्रगीत और मातृभूमि की भक्ति

दक्षिण एशिया में ही एक और उदाहरण देखिए। श्रीलंका का राष्ट्रगीत अत्यंत कर्णप्रिय है, और उसका भाव वन्दे मातरम से बहुत मिलता जुलता है।

Śrī laṅkā mātā, apa Śrī laṅkā
Namō namō namō namō mātā

देवनागरी में
श्री लंका माता, अप श्री लंका
नमो नमो नमो नमो माता

यहाँ सीधे अपनी भूमि को माता कहकर उसकी भक्ति और पूजा की बात की गई है। यह कोई “धर्मनिरपेक्ष” शब्दावली नहीं, बल्कि सभ्यता की परंपरागत दृष्टि है, जिसमें राष्ट्र किसी कंपनी की तरह नहीं, माँ की तरह समझा जाता है।

श्रीलंका भी संविधान की दृष्टि से आधुनिक राष्ट्र राज्य है, वहाँ तमिल, मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक हैं, राजनीतिक विवाद हैं, गृहयुद्ध का इतिहास है। लेकिन राष्ट्रगान में “माता” शब्द बना रहा, उसे काटकर कोई “श्रीलंका हमारा गणतंत्र” जैसा फीका वाक्य नहीं लिख दिया गया।

और भारत, जिसने दुनिया को “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” कहा, वही देश अपने सबसे शक्तिशाली मातृराष्ट्र गीत वन्दे मातरम को खुद ही तोड़फोड़ कर बैठा, केवल इसलिए कि 1937 में जिन्ना की मजहबी राजनीति को खुश करना था, और 1947 के बाद भी वही मानसिक गुलामी जारी रखनी थी।

भारतीय संविधान, धर्मनिरपेक्षता और सांस्कृतिक बहुमत

भारत का संविधान अनुच्छेद 25 से 28 तक धर्म की स्वतंत्रता और राज्य के स्तर पर निर्पेक्षता की बात करता है। पर कहीं भी यह नहीं लिखा कि भारतीय राज्य अपनी बहुसंख्यक सांस्कृतिक विरासत से घृणा करेगा, या उसे सार्वजनिक जीवन से निर्वासित कर देगा। “सेकुलर” शब्द संविधान में बाद में जोड़ा गया, लेकिन हमारी परंपरा में धार्मिक निरपेक्षता का अर्थ रहा “समभाव”, राज्य किसी एक मजहब का पक्ष नहीं लेगा, पर समाज की बहुसंख्यक स्मृति को अपराध नहीं मानेगा।

दरअसल समस्या संविधान से कम और उसके ऊपर बैठी उस वैचारिक परत से ज्यादा है जिसने हिन्दू देवी देवताओं, हिन्दू प्रतीकों, हिन्दू इतिहास और हिन्दू national imagination को ही “communal” शब्द से बांध दिया।

परिणाम यह हुआ कि क्रिश्चियन god से प्रार्थना करने वाले अमेरिकी या ब्रिटिश राष्ट्रगान को प्रगतिशील कहा गया, और दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती जैसे प्रतीकों को भारतीय सार्वजनिक जीवन से ठेलने की मुहिम को secularism का नाम दे दिया गया।

भारत में समस्या god शब्द से नहीं, केवल इस बात से है कि वह god अगर हिन्दू देवी या देवता की रूपरेखा में आता है तो वैचारिक वर्ग बेचैन हो जाता है। वही वर्ग रूस के राष्ट्रगान की उस पंक्ति पर चुप रहता है जिसमें मातृभूमि को god द्वारा संरक्षित बताया जाता है।

राष्ट्रीय गीत की पूर्ण प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की बहाली

राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत कोई महासभा के लिए पढ़ा जाने वाला याचिकापत्र नहीं, वे किसी सभ्यता की गहरी आत्म-छवि होते हैं। भारत के लिए यह छवि वन्दे मातरम के छह के छह अंतरों में अधिक प्रखर रूप से उपस्थित है, जन गण मन की अपेक्षा भी अधिक गहराई और भावनात्मक ऊँचाई के साथ।

एक, राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को पत्थर की लकीर मानने की मानसिकता तोड़नी होगी। पश्चिमी देशों ने यह कर दिखाया है। भारत भी अपने राष्ट्रीय प्रतीकों पर पुनर्विचार कर सकता है, और यह पुनर्विचार किसी “सांप्रदायिक क्रांति” के नाम पर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक न्याय के रूप में होना चाहिए।

दो, वन्दे मातरम को उसके पूरे रूप में सम्मान देने की दिशा में जाना होगा। इसे केवल दो अंतरों तक सीमित रखने की आत्मद्रोही नीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ेगा।

यह संभव है कि तत्काल संवैधानिक संशोधन की जगह पहले चरण में सांस्कृतिक गरिमा बहाल की जाए, शिक्षा, मीडिया, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सार्वजनिक समारोहों में वन्दे मातरम के सम्पूर्ण पाठ को सम्मान प्राप्त हो, विवाद का नहीं, गौरव का विषय बनाया जाए।

यूरोप और अमेरिका को God से कोई भय नहीं, क्योंकि वह उनके ईसाई इतिहास का हिस्सा है। रूस को भी अपने राष्ट्रगीत में God से मातृभूमि की रक्षा की प्रार्थना करने में कोई संकोच नहीं। श्रीलंका अपनी भूमि को माता कहकर संबोधित करता है।

केवल भारत ऐसा राष्ट्र न बने जो दुनिया को धर्म, दर्शन और आध्यात्मिकता की भाषा देता रहा, पर खुद अपनी ही माँ को पुकारने से डरता रहे। वन्दे मातरम को आधा गाकर और आधा काटकर रखा जाएगा तो यह केवल एक गीत की नहीं, पूरी सभ्यता की आवाज को आधा कर देने जैसा अपराध रहेगा।

WhatsApp Channel Join Now
Telegram Channel Join Now
Mudit
Mudit
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं और 9 वर्षों से भारतीय इतिहास, धर्म, संस्कृति, शिक्षा एवं राजनीति पर गंभीर लेखन कर रहे हैं।
- Advertisement -
- Advertisement -

Latest article