एपस्टीन फाइल्स में मोदी ?
भारतीय राजनीति में वामपंथी और तथाकथित उदारवादी खेमे की हताशा अब अपने चरम पर पहुँच चुकी है और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हाल ही में देखने को मिला है।
यह खेमा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चरित्र हनन के लिए अब एक ऐसे तिनके का सहारा ले रहा है जो न केवल कमजोर है, बल्कि उन्हीं के पाले में आग लगाने के लिए पर्याप्त है। वामपंथी लॉबी जेफ्री एपस्टीन जैसे कुख्यात अपराधी के एक कथन को तोड़-मरोड़ कर यह स्थापित करने का प्रयास कर रही है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमेरिका के इशारों पर नाचते हैं।
वास्तविकता यह है कि यह आरोप न केवल बेबुनियाद है, बल्कि यह उस औपनिवेशिक मानसिकता का परिचायक है जो भारत के स्वाभिमान को पचा नहीं पाती है। एपस्टीन ने केवल यह कहा था कि 2017 की इजरायल यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति के लाभ के लिए “नृत्य और गायन” किया और यह सब काम कर गया।
यह समझना आवश्यक है कि अंग्रेजी भाषा में “नृत्य और गायन” एक मुहावरा है जिसका अर्थ कूटनीतिक पैंतरेबाजी और किसी को रिझाने के प्रयास से होता है, न कि शाब्दिक रूप से नाचने या गाने से।
इस सामान्य मुहावरे को वामपंथी जमात ने एक कुत्सित अर्थ देकर प्रचारित किया है जो उनकी बौद्धिक दरिद्रता को दर्शाता है।
इजरायल के साथ संबंधों का नया अध्याय और मोदी की कूटनीति
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 2017 की इजरायल यात्रा भारतीय विदेश नीति के इतिहास में एक निर्णायक क्षण थी, जिसे वामपंथी बुद्धिजीवी अपनी संकीर्ण दृष्टि के कारण देख नहीं पा रहे हैं।
यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली इजरायल यात्रा थी, जिसने दशकों से चली आ रही फिलिस्तीन के साथ संबंधों की हिचकिचाहट को समाप्त करते हुए भारत और इजरायल के रिश्तों को एक नई और स्वतंत्र दिशा दी। इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने न तो अमेरिका का कोई जिक्र किया और न ही किसी अमेरिकी एजेंडे को आगे बढ़ाया।
उनका पूरा ध्यान भारत के हितों पर केन्द्रित था, जिसमें रक्षा सहयोग, कृषि तकनीक और जल शोधन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल थे। जिस “डिसालिनेशन” (लवणहरण) तकनीक की बात की गई, वह भारत के सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए इजरायल की एक अनुपम भेंट थी।
रक्षा सौदों ने भारत की सामरिक शक्ति को मजबूती प्रदान की। यह सब भारत के राष्ट्रीय हितों के संवर्धन के लिए था, न कि किसी तीसरे देश को खुश करने के लिए। एक सच्चा और देशभक्त प्रधानमंत्री वही करता है जो उसके राष्ट्र के लिए सर्वोपरि हो, और नरेन्द्र मोदी ने ठीक वही किया। इस यात्रा को अमेरिका के चश्मे से देखना भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का अपमान है।
एपस्टीन की राजनीतिक कुंठा और पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण
जेफ्री एपस्टीन के कथन को समझने के लिए हमें उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि और उसके निहित स्वार्थों को भी समझना होगा। एपस्टीन अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी और हिलेरी क्लिंटन का एक प्रमुख डोनर और समर्थक था, जबकि 2010 तक उसके संबंध डोनाल्ड ट्रम्प से खराब हो चुके थे।
इसके अतिरिक्त, एपस्टीन ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि वह इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री एहूद बराक के साथ बहुत निकटता से काम करता था। यह सर्वविदित है कि एहूद बराक और इजरायल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच गहरे राजनीतिक मतभेद थे और उनके रिश्ते शत्रुतापूर्ण थे।
चूंकि प्रधानमंत्री मोदी ने नेतन्याहू के साथ घनिष्ठ मित्रता स्थापित की थी, इसलिए एपस्टीन का मोदी से चिढ़ना स्वाभाविक था। एक पक्षपाती व्यक्ति के रूप में, मोदी और नेतन्याहू के बीच की प्रगाढ़ता उसे खटक रही थी, और इसी हताशा में उसने मोदी पर अमेरिकी धुनों पर नाचने का झूठा आरोप मढ़ दिया।
एपस्टीन का यह कथन वास्तव में उसकी अपनी राजनीतिक कुंठा और डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति उसकी वफादारी का परिणाम था, जिसे भारत के वामपंथी अब ब्रह्मवाक्य मानकर प्रचारित कर रहे हैं।
राहुल गांधी का बोस्टन कांड और अमेरिकी एजेंसियों का शिकंजा
अब जरा उस पाखंड और दोहरे मापदंड की बात करते हैं जो भारतीय राजनीति के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष रक्षकों के चरित्र को उजागर करता है। एक तरफ जहाँ मोदी पर आधारहीन आरोप लगाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी के अतीत के काले पन्नों को बड़ी सफाई से दबा दिया गया है।
वर्ष 2002 में, बोस्टन के लोगान हवाई अड्डे पर एफबीआई द्वारा राहुल गांधी की गिरफ्तारी की खबरें सामने आई थीं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्हें कोकीन और लगभग 1,60,000 डॉलर की संदिग्ध नगदी के साथ पकड़ा गया था। विडंबना देखिए कि उस समय भारत के प्रमुख समाचार पत्रों ने इस खबर को प्रकाशित किया था। लेकिन बाद के वर्षों में, जैसे किसी अदृश्य शक्ति के दबाव में, इन मीडिया संस्थानों ने अपनी ही रिपोर्ट्स को गलत बताते हुए ‘फैक्ट-चेक’ के नाम पर लीपापोती कर दी।
आज वही राजनीतिक वर्ग और उनके दरबारी, जो मोदी पर उंगली उठाते हैं, राहुल गांधी से इस गिरफ्तारी पर स्पष्टीकरण मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। यह चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। क्या यह देश का अधिकार नहीं है कि वह जाने कि एक प्रमुख विपक्षी नेता विदेश में किन परिस्थितियों में पकड़ा गया था?
संप्रभुता से समझौता और विदेशी दबाव का खेल
राहुल गांधी को उस समय अमेरिकी एजेंसियों द्वारा छोड़ा जाना महज एक संयोग नहीं था, बल्कि यह एक गहरी कूटनीतिक चाल का हिस्सा प्रतीत होता है। अमेरिका ने संभवतः यह भांप लिया था कि राहुल गांधी को छोड़कर वे भविष्य के लिए कांग्रेस पार्टी और भारत की राजनीति पर एक मजबूत पकड़ बना सकते हैं।
एक ऐसा नेता जिसका अतीत विदेशी एजेंसियों की फाइलों में कैद हो, वह सत्ता में आने पर कभी भी स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकता। यदि राहुल गांधी कभी भारत की सत्ता संभालते हैं, तो अमेरिका के पास उनकी गिरफ्तारी, ‘बॉडी कैविटी सर्च’ और रिहाई के लिए की गई उनकी गिड़गिड़ाहट के सबूत मौजूद होंगे, जिनका उपयोग वे भारत को ब्लैकमेल करने के लिए कर सकते हैं।
यह ‘क्विड प्रो क्वो’ (लेन-देन) की राजनीति का सबसे घिनौना रूप है। इसका एक ज्वलंत उदाहरण हमें यूपीए सरकार के दौरान देखने को मिला था, जब तमिलनाडु में रूस के सहयोग से बन रहे कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के खिलाफ ईसाई मिशनरियों और एनजीओ ने महीनों तक नाकेबंदी की थी।
यह परियोजना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण थी, लेकिन ओबामा प्रशासन रूस के प्रभाव को कम करना चाहता था। तत्कालीन कांग्रेस सरकार सब कुछ जानते हुए भी मूकदर्शक बनी रही, क्योंकि कोई भी कठोर देशभक्तिपूर्ण कार्रवाई ओबामा प्रशासन को राहुल गांधी के बोस्टन कांड की फाइलें खोलने पर मजबूर कर सकती थी।
दरबारी संस्कृति और राष्ट्रवाद का अपमान
भारत का दुर्भाग्य है कि यहाँ एक ऐसा वर्ग है जो राष्ट्रहित के ऊपर एक परिवार की भक्ति को रखता है। ये दरबारी वास्तव में देशभक्त नहीं हैं, बल्कि ये मानसिक रूप से आज भी औपनिवेशिक शक्तियों के गुलाम हैं।
इन्हें भारत के एक ईमानदार और राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री को गाली देने में एक विकृत आनंद मिलता है, जबकि ये अपने ही नेताओं के अपराधों और विदेशी सांठगांठ पर आँखें मूंद लेते हैं। ये वही लोग हैं जो बराक ओबामा द्वारा अपनी आत्मकथा में राहुल गांधी के बारे में की गई अपमानजनक टिप्पणी को भी पी गए।
ओबामा ने स्पष्ट रूप से लिखा था कि राहुल गांधी उस छात्र की तरह हैं जो शिक्षक को प्रभावित करने के लिए उत्सुक तो है, लेकिन जिसमें विषय में महारत हासिल करने की योग्यता या जुनून की कमी है। कांग्रेस समर्थक बुद्धिजीवियों ने इस अपमान को ऐसे नजरअंदाज कर दिया जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह उनकी टेस्टोस्टेरोन-रहित कायरता और रीढ़विहीन व्यक्तित्व का परिचायक है।
ऐसे में, जब एक तरफ मोदी जैसा नेता है जो विश्व मंच पर भारत का मस्तक ऊंचा कर रहा है, और दूसरी तरफ ऐसा विपक्ष है जो अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए विदेशी ताकतों के आगे नतमस्तक है, तो जनता को यह तय करना होगा कि राष्ट्र का भविष्य किसके हाथों में सुरक्षित है।

