मोदी युग
अखण्ड नेतृत्व का ऐतिहासिक कालखंड
भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में जब भी नेतृत्व की दृढ़ता और निरंतरता का अध्याय लिखा जाएगा, तो वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उल्लेख के बिना अधूरा रहेगा। सार्वजनिक जीवन में एक जननेता का मूल्यांकन केवल उसके पद पर बने रहने की अवधि से नहीं, अपितु इस बात से होता है कि उसने राष्ट्र की चेतना को किस गहराई तक प्रभावित किया है।
अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने से लेकर आज 30 दिसंबर 2025 तक का यह कालखंड केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह भारत के राजनीतिक विमर्श में आए एक युगांतरकारी बदलाव का साक्षी है।
यह अपने आप में एक विलक्षण उदाहरण है कि कैसे एक व्यक्ति, जिसका कोई राजनीतिक ‘गॉडफादर’ नहीं था, सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है और फिर बिना संसद की सीढ़ियाँ चढ़े सीधे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री बनता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी ‘जनमत’ होती है और पिछले 24 वर्षों में चाहे विधानसभा के चुनाव हों या लोकसभा के महासमर, मोदी के नेतृत्व में ‘पराजय’ शब्द ने अपना अर्थ खो दिया है।
सत्ता के शीर्ष पर दो दशक से अधिक समय तक बने रहना और उस पर भी बेदाग बने रहना, यह किसी तपस्या से कम नहीं है। भारतीय राजनीति का यह दुर्भाग्यपूर्ण सत्य रहा है कि यहाँ सत्ता में कुछ समय बिताते ही राजनेताओं पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के छींटे पड़ने लगते हैं।
यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें तो अटल बिहारी वाजपेयी को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री मिले जिसका दामन पूरी तरह पाक-साफ रहा हो। नरेन्द्र मोदी इस परंपरा के अपवाद हैं।
विपक्ष ने राफेल से लेकर तमाम मुद्दों पर धूल उड़ाने के अनगिनत प्रयास किए, किन्तु जनता की अदालत में मोदी की छवि एक ऐसे ‘कर्मयोगी’ की बनी रही जिसके लिए राष्ट्रहित से ऊपर कुछ भी नहीं है। यह विश्वसनीयता एक दिन में अर्जित नहीं की गई है, यह उस सुचिता और पारदर्शिता का परिणाम है जिसमें परिवारवाद और तुष्टीकरण के लिए रत्ती भर भी स्थान नहीं है।
आपदाओं के बीच तपता नेतृत्व
नरेन्द्र मोदी का राजनीतिक सफर किसी सुगम पथ पर नहीं, बल्कि अंगारों पर चलकर तय हुआ है। वर्ष 2001 में जब उन्हें गुजरात की कमान सौंपी गई, तब कच्छ का विनाशकारी भूकंप राज्य की रीढ़ तोड़ चुका था। चारों ओर तबाही का मंजर था और प्रशासन का मनोबल टूटा हुआ था। प्रशासनिक अनुभव की कमी के ताने देने वालों को मोदी ने अपने काम से जवाब दिया।
उन्होंने भुज और कच्छ का जिस प्रकार पुनरुद्धार किया, वह आज पूरी दुनिया में आपदा प्रबंधन का एक उत्कृष्ट उदाहरण (Case Study) माना जाता है। उन्होंने आपदा को अवसर में बदलने का जो मंत्र दिया, वह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि कच्छ के रण में उगी विकास की फसल उसकी गवाह है।
इसके ठीक बाद, फरवरी 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों में कारसेवकों को जिन्दा जलाने की जो पैशाचिक घटना हुई, उसने गुजरात को हिलाकर रख दिया। उस नृशंस हत्याकांड की प्रतिक्रिया में भड़के दंगों को नियंत्रित करने के लिए मोदी सरकार ने पड़ोसी राज्यों से पुलिस बल की मांग की, जिसे राजनीतिक द्वेष के कारण ठुकरा दिया गया।
यह एक ऐसा ऐतिहासिक सत्य है जिसे अक्सर ‘सेक्युलर’ विमर्श के शोर में दबा दिया जाता है। इसके बावजूद, सेना को बुलाने में तत्परता दिखाई गई और स्थिति को संभाला गया। विडंबना देखिए कि तथाकथित मानवाधिकार के ठेकेदारों ने दंगों का सारा दोष मोदी पर मढ़ दिया, किन्तु गोधरा के मूल अपराध पर सुविधाजनक चुप्पी साध ली।
सत्य यह है कि 2002 के बाद पिछले 23 वर्षों में गुजरात में एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ। जिस राज्य में कर्फ्यू एक दिनचर्या बन चुका था, वहां स्थायी शांति की स्थापना करना मोदी की प्रशासनिक दृढ़ता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
स्थितप्रज्ञता: आलोचनाओं के शोर में कर्म की साधना
प्रधानमंत्री मोदी की कार्यशैली का सबसे सशक्त पहलू उनकी ‘स्थितप्रज्ञता’ है। उन्होंने अपने विरोधियों और आलोचकों से निपटने के लिए एक अद्वितीय रणनीति अपनाई है, जिसे हम ‘उपेक्षा और कर्म’ का सिद्धांत कह सकते हैं।
जब उन पर व्यक्तिगत हमले किए गए, उन्हें ‘मौत का सौदागर’ कहा गया, और तत्कालीन केंद्र सरकार ने सीबीआई तथा आईबी जैसी संस्थाओं का दुरुपयोग कर उन्हें फंसाने का कुचक्र रचा, तब भी मोदी ने अपना धैर्य नहीं खोया।
अमित शाह को जेल भेजा गया, मोदी से घंटों पूछताछ की गई, और पूरी सरकारी मशीनरी का उपयोग उन्हें तोड़ने के लिए किया गया। एक सामान्य राजनेता ऐसी परिस्थितियों में या तो टूट जाता या फिर प्रतिशोध की राजनीति पर उतर आता।
किन्तु, मोदी ने अपने विरोधियों के स्तर पर जाकर उत्तर देने के बजाय अपनी ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण में खपाना उचित समझा। उन्होंने आलोचनाओं के पत्थरों से ही अपने लिए सफलता की सीढ़ियाँ बनाईं। उन्होंने गुजरात में विकास की एक ऐसी लकीर खींची जिसे छोटा करना उनके विरोधियों के लिए असंभव हो गया।
वे जानते थे कि शब्दों के प्रहार का उत्तर शब्दों से देने से केवल शोर बढ़ता है, जबकि काम से दिया गया उत्तर इतिहास बदलता है। इशरत जहाँ मामले में जिस प्रकार राष्ट्र की सुरक्षा एजेंसियों को आपस में लड़वाने का राष्ट्रघाती प्रयास तत्कालीन सत्ताधीशों ने किया, उसे भी मोदी ने नीलकंठ की भांति सहन किया।
उनकी यह चुप्पी कमजोरी नहीं, बल्कि उस आत्मविश्वास का परिचायक थी जो सत्य के मार्ग पर चलने वाले को प्राप्त होता है। इसी रणनीति के कारण, उनके विरोधी आज राजनीतिक अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं, जबकि मोदी का कद हिमालय की भांति अडिग है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और वैश्विक पटल पर भारत का स्वाभिमान
नरेन्द्र मोदी ने भारत को उस हीनभावना से मुक्त कराया है जो दशकों से ‘नेहरूवादी सेक्युलरिज्म’ के नाम पर थोपी जा रही थी। उन्होंने इजरायल जैसे राष्ट्रों के इतिहास और संघर्ष से यह सीखा है कि एक राष्ट्र का सम्मान उसके नागरिकों के आत्मगौरव और सुरक्षा में निहित है।
जिस प्रकार इजरायल ने चारों ओर शत्रुओं से घिरे होने के बावजूद अपने राष्ट्र को खड़ा किया और अपनी शर्तों पर जीना सीखा, उसी प्रकार मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह संदेश दिया कि हम अब ‘सॉफ्ट स्टेट’ नहीं हैं। ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और ‘एयर स्ट्राइक’ केवल सैन्य कार्रवाई नहीं थीं, बल्कि यह भारत की बदलती हुई मानसिकता का उद्घोष थीं।
ब्रिटेन, जिसने हमें दो शताब्दियों तक गुलाम बनाकर रखा, आज आर्थिक मोर्चे पर भारत से पिछड़ चुका है। यह केवल अर्थव्यवस्था के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह उस सभ्यतागत पुनरुत्थान का प्रतीक है जिसे मोदी के नेतृत्व ने संभव बनाया है।
आज भारत ‘ग्लोबल साउथ’ का नेतृत्व कर रहा है और रूस-यूक्रेन जैसे जटिल भू-राजनीतिक संकटों में भी दुनिया भारत की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रही है। यह स्थिति रातोंरात उत्पन्न नहीं हुई है, बल्कि यह उस ‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति का परिणाम है जिसका पालन मोदी ने पिछले 24 वर्षों से अविरल किया है।
विपक्ष की सबसे बड़ी विफलता यह रही है कि वह मोदी की इस विराट सोच और कार्यशैली को समझने में असमर्थ रहा और तुच्छ व्यक्तिगत आक्षेपों में उलझा रहा। 2026 की दहलीज पर खड़ा भारत आज जिस आत्मविश्वास से भरा है, उसका श्रेय उस नेतृत्व को जाता है जिसने अपमान के विष को पचाकर राष्ट्र के लिए अमृत का सृजन किया है। जब तक विपक्ष नकारात्मकता की राजनीति करेगा, तब तक मोदी अपनी सकारात्मक ऊर्जा और कर्मठता से नई ऊंचाइयों को छूते रहेंगे।

