मणिकर्णिका
मोक्षदायिनी काशी की पीड़ा और दशकों की उपेक्षा
काशी केवल एक शहर नहीं है अपितु यह सनातन संस्कृति का शाश्वत केंद्र है जहां मृत्यु भी उत्सव बन जाती है। मणिकर्णिका घाट जिसे महाशमशान कहा जाता है वहां चिता की अग्नि कभी शांत नहीं होती और इसे मोक्ष का द्वार माना जाता है।
जब कोई व्यक्ति अपने प्रियजन की अंतिम विदाई के लिए यहां आता है तो वह पहले ही भावनाओं के भंवर में फंसा होता है और दुख के उस पहाड़ के नीचे दबा होता है। ऐसे समय में जब उसे घाट पर अव्यवस्था, गंदगी और मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव मिलता था तो उसकी वेदना कई गुना बढ़ जाती थी।

दशकों से मणिकर्णिका घाट पर बैठने की समुचित व्यवस्था नहीं थी और न ही स्वच्छ शौचालयों का कोई प्रबंध था। दाह संस्कार के लिए घंटों का इंतजार और उसके बाद राख या अवशेषों की सफाई की कोई सुव्यवस्थित प्रणाली न होना एक ऐसी विडंबना थी जिसे काशीवासियों ने अपनी नियति मान लिया था।
यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकारों के कार्यकाल में हिंदुओं की आस्था के इस सर्वोच्च केंद्र को इतनी उपेक्षा क्यों झेलनी पड़ी। क्या हिंदू समाज के अंतिम संस्कार में भी गरिमा का अधिकार नहीं था।
आज जब विकास का सूर्य उदय हुआ है तो कुछ विघ्नसंतोषी तत्वों को अचानक पुरातत्व और धरोहर की याद आने लगी है जो दशकों तक गंदगी के ढेर पर मौन साधे बैठे थे।
प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी का संकल्प
वर्तमान समय में काशी एक ऐतिहासिक परिवर्तन की साक्षी बन रही है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी मार्गदर्शन और माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी के कुशल नेतृत्व में मणिकर्णिका घाट के पुनरुद्धार का जो महायज्ञ आरंभ हुआ है वह केवल ईंट और पत्थर का निर्माण कार्य नहीं है बल्कि यह एक सांस्कृतिक अनुष्ठान है।
इस परियोजना का मूल उद्देश्य किसी भी प्राचीन मंदिर या ऐतिहासिक धरोहर को क्षति पहुंचाना नहीं है बल्कि उन्हें संरक्षित करते हुए घाट की व्यवस्थाओं को आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना है।

हम सभी जानते हैं कि समय के साथ काशी में श्रद्धालुओं और शव यात्रियों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। स्कंदपुराण के समय की काशी और आज की काशी की जनसांख्यिकी में जमीन आसमान का अंतर है।
आज मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के लिए सुव्यवस्थित प्लेटफॉर्म का निर्माण हो रहा है ताकि किसी को कीचड़ या गंदगी में अंतिम क्रिया न करनी पड़े। लकड़ी भंडारण के लिए विशिष्ट स्थान बनाए जा रहे हैं ताकि वर्षा ऋतु में भी दाह संस्कार बाधित न हो।

इसके अतिरिक्त पूजा सामग्री के लिए निर्धारित स्थान, मुंडन संस्कार के लिए स्वच्छ क्षेत्र और आगंतुकों के बैठने की व्यवस्था जैसी सुविधाएं विकसित की जा रही हैं।
यह वही मॉडल है जिसे काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में सफलतापूर्वक लागू किया गया था और जिसकी प्रशंसा आज पूरा विश्व कर रहा है।
अफवाहों का बाजार और एआई का दुरुपयोग
दुर्भाग्य का विषय यह है कि जब भी सनातन संस्कृति के उत्थान का कोई कार्य होता है तो एक विशेष इकोसिस्टम सक्रिय हो जाता है जिसका उद्देश्य केवल भ्रम फैलाना और विकास को बाधित करना होता है। मणिकर्णिका घाट के संदर्भ में भी सोशल मीडिया पर एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत दुष्प्रचार किया जा रहा है।
विपक्ष और राष्ट्र विरोधी तत्वों द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अर्थात एआई का दुरुपयोग करके भ्रामक वीडियो बनाए और फैलाए जा रहे हैं जिनमें यह दर्शाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है कि घाट पर मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ा जा रहा है।

यह वही जमात है जिसने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के समय भी इसी प्रकार का विलाप किया था और आज वही लोग कॉरिडोर की भव्यता को देखकर निरुत्तर हैं। वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया पर चल रहा यह विवाद पूरी तरह से निराधार और द्वेषपूर्ण है।
घाट की सीढ़ियों के पुनर्निर्माण और मढ़ी के जीर्णोद्धार के दौरान तकनीकी कारणों से कुछ शिल्प और आकृतियों को अस्थायी रूप से हटाया गया है। यह एक सामान्य निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा है।
इन सभी मूर्तियों और कलाकृतियों को संस्कृति विभाग की देखरेख में अत्यंत सम्मान और सुरक्षा के साथ संरक्षित किया गया है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि निर्माण कार्य पूर्ण होते ही इन धरोहरों को उनके मूल स्थान पर पुनः पूरे विधि विधान के साथ स्थापित कर दिया जाएगा।
ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण और सत्य
मणिकर्णिका घाट के कायाकल्प को लेकर जो सबसे बड़ा झूठ फैलाया जा रहा है वह लोकमाता अहिल्याबाई होलकर जी की प्रतिमा और प्राचीन मंदिरों के विध्वंस से संबंधित है।
यह सत्य सर्वविदित है कि अहिल्याबाई होलकर ने मुगलों द्वारा नष्ट किए गए हिंदू तीर्थों का पुनरुद्धार किया था और आज की सरकार उन्हीं के पदचिन्हों पर चलते हुए जीर्ण क्षीर्ण व्यवस्था को सुधार रही है।

स्थानीय विधायक डॉ नीलकंठ तिवारी और प्रशासन ने बार बार यह स्पष्ट किया है कि अहिल्याबाई होलकर की मूर्ति को पूर्णतः संरक्षित किया गया है और उसे यथास्थान सम्मानपूर्वक स्थापित किया जाएगा।
इसके अतिरिक्त घाट पर स्थित मसानेनाथ मंदिर, महाकाल मंदिर और तारकेश्वर महादेव मंदिर जैसे सभी प्रमुख देवालय पूरी तरह सुरक्षित हैं और उन्हें किसी भी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचाई गई है।
जो मढ़ी ड्रिलिंग के कंपन से प्रभावित हुए हैं उनमें रखी मूर्तियों को भी संस्कृति विभाग ने अपने संरक्षण में ले लिया है। यह परियोजना रूपा फाउंडेशन द्वारा अपने सीएसआर दायित्व के अंतर्गत वित्तपोषित है और इसका उद्देश्य केवल और केवल सुविधाओं का उन्नयन है।
घाट के पंडा समाज, स्थानीय नागरिक और व्यवसायी इस विकास कार्य का पूर्ण समर्थन कर रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यह परिवर्तन उनके और आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना आवश्यक है।
बदलती काशी और आधुनिक आवश्यकताएं
हमें यह समझना होगा कि परंपरा और आधुनिकता में कोई विरोधाभास नहीं है। स्कंदपुराण में वर्णित काशी का स्वरूप आध्यात्मिक है किंतु आज की भौगोलिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताएं अलग हैं।
पंद्रह वर्ष पूर्व काशी में जितनी भीड़ आती थी आज उसकी संख्या दस गुना बढ़ चुकी है। ऐसे में पुराने मंदिरों और उनके परिक्षेत्रों में भीड़ प्रबंधन एक चुनौती बन गया है।
यदि हम संकरी गलियों और जर्जर सीढ़ियों को ज्यों का त्यों छोड़ देंगे तो यह श्रद्धालुओं के जीवन के साथ खिलवाड़ होगा। अनावश्यक निर्माण और अतिक्रमण को हटाकर रास्तों को सुगम बनाना सरकार की प्राथमिकता है और यह जनहानि को रोकने के लिए अपरिहार्य है।
मणिकर्णिका घाट के साथ साथ हरिश्चंद्र घाट का भी जीर्णोद्धार किया जा रहा है। नवीनीकरण के पश्चात यहां स्वच्छ शौचालय, चेंजिंग रूम और पेयजल जैसी वह सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी जो वर्तमान में नदारद हैं।
यह परिवर्तन केवल सुविधा का प्रश्न नहीं है बल्कि यह उस गरिमा का प्रश्न है जो हर हिंदू को अपनी अंतिम यात्रा में मिलनी चाहिए।
जो लोग वातानुकूलित कमरों में बैठकर सोशल मीडिया पर भ्रामक टिप्पणियां कर रहे हैं उन्हें काशी के धरातल की वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है। वे नहीं जानते कि एक शव यात्री को मूलभूत सुविधाओं के अभाव में कितनी पीड़ा होती है।
शिव की नगरी में शिव की इच्छा
काशी के कण कण में भगवान शंकर का वास है और यहां एक ईंट भी महादेव की इच्छा के बिना नहीं हिल सकती। यह शाश्वत सत्य है कि बनारस की धार्मिक समृद्धि को उजाड़ने की सामर्थ्य किसी मनुष्य में नहीं है।
चाहे वह प्रधानमंत्री मोदी हों या मुख्यमंत्री योगी, वे केवल निमित्त मात्र हैं जो काल के प्रवाह में काशी को उसका खोया हुआ गौरव लौटाने का प्रयास कर रहे हैं।
मणिकर्णिका घाट का यह कायाकल्प किसी एक परियोजना भर का हिस्सा नहीं है बल्कि यह काशी की आस्था और मानवीय गरिमा को सुदृढ़ करने का महाअभियान है। जो लोग हिंदुत्व के ठेकेदार बनकर सरकार के हर अच्छे कार्य का विरोध कर रहे हैं उन्हें अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।
क्या उन्होंने कभी उन शौचालयों की कमी पर आवाज उठाई थी जब माताएं और बहनें घाट पर शर्मसार होती थीं। आज जब व्यवस्था सुधर रही है तो उनका विरोध उनके खोखलेपन को ही प्रदर्शित करता है।
मणिकर्णिका का यह नवसृजन उस संकल्प का प्रतीक है कि भारत अब अपनी आस्था के केंद्रों को उपक्षित नहीं छोड़ेगा। यह कार्य काशी की उस शाश्वत दिव्यता को और अधिक सशक्त करेगा ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस पावन नगरी की गरिमा और व्यवस्थाओं पर गर्व कर सकें।
विरोध के स्वर समय के साथ लुप्त हो जाएंगे किंतु विकास और सेवा का यह अध्याय काशी के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।

