मध्य प्रदेश में हर रोज गायब हो रहीं 43 लड़कियां: मध्य प्रदेश के सागर ज़िले में एक साधारण से घर के बाहर बैठे सनत मिश्रा आज भी उसी सवाल के जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं, जो पिछले 13 सालों से उनकी ज़िंदगी में अटका हुआ है।
उनकी बहन कुमोदिनी मिश्रा साल 2012 में घर से निकली थीं और फिर कभी लौटकर नहीं आईं। समय बीतता गया, लेकिन जवाब नहीं मिला।
13 साल से खुला है घर का दरवाज़ा
कुमोदिनी उस रात मामा के घर टीवी देखने जाने की बात कहकर निकली थीं। घरवालों ने सोचा था कि थोड़ी देर में लौट आएंगी, लेकिन वो कभी वहां पहुंचीं ही नहीं।
परिवार ने रिश्तेदारों, आस-पास के गांवों, शहरों और थानों के चक्कर लगाए, लेकिन हर जगह से खाली हाथ लौटना पड़ा।
मां उर्मिला आज भी बेटी का नाम सुनते ही टूट जाती हैं। वो कहती हैं कि समय ज़ख्म भर नहीं पाया, बल्कि दर्द को और गहरा कर गया।
घर में उसकी पसंद का खाना बनता है तो मां का दिल भर आता है।
कुमोदिनी अकेली नहीं हैं
कुमोदिनी की कहानी कोई एक मामला नहीं है। मध्य प्रदेश के लगभग हर जिले में ऐसे परिवार मिल जाएंगे, जिनकी बेटियां या महिलाएं सालों से लापता हैं।
इंतज़ार है, उम्मीद है, लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं।
केंद्र सरकार के अनुसार, साल 2019 से 2021 के बीच मध्य प्रदेश में करीब दो लाख लड़कियां और महिलाएं लापता हुईं, जो पूरे देश में सबसे ज्यादा है।
हर दिन 43 लड़कियां हो रही लापता
राज्य सरकार के आंकड़े बताते हैं कि जनवरी 2024 से जून 2025 के बीच 23,129 लड़कियां और महिलाएं मध्य प्रदेश में गुमशुदा हुईं।
इसका मतलब है कि हर दिन औसतन 43 महिलाएं या लड़कियां लापता हो रही हैं। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की टूटी हुई ज़िंदगियों की कहानी है।
बच्चियों की तलाश के लिए ऑपरेशन
राज्य की महिला सुरक्षा शाखा के एडीजी अनिल कुमार का कहना है कि 2013 के बाद नाबालिग बच्चों के गुम होने पर तुरंत अपहरण की धाराओं में एफआईआर दर्ज होती है।
उनके अनुसार लगभग 42% किशोरियां घर से नाराज़ होकर चली जाती हैं। 15% रिश्तेदारों के यहां जाती हैं।
19–20% मामलों में प्रेम संबंध वजह होते हैं। पुलिस यह भी कहती है कि बच्चियों की तलाश के लिए ऑपरेशन मुस्कान चलाया जा रहा है, जिससे कई मामलों में सफलता मिली है।
18 साल से ऊपर की महिलाओं की अनदेखी
सबसे बड़ा सवाल 18 साल से अधिक उम्र की महिलाओं को लेकर है। पुलिस मानती है कि ऐसे मामलों में अक्सर एफआईआर दर्ज ही नहीं होती।
जब तक मानव तस्करी या अपहरण जैसे गंभीर अपराध सामने न आएं, जांच स्थानीय थानों की फाइलों तक सीमित रह जाती है।
यही वजह है कि कई मामले कभी गंभीर जांच तक पहुंच ही नहीं पाते।
परिवारों की शिकायतें
सनत मिश्रा जैसे कई परिजन कहते हैं कि पुलिस ने शुरू से ही मामले को गंभीरता से नहीं लिया। शुरुआती घंटों और दिनों में अगर तेज़ी से कार्रवाई होती, तो शायद नतीजा कुछ और होता।
2013 से पहले गुमशुदगी के मामलों में एफआईआर अनिवार्य नहीं थी, और कुमोदिनी का मामला भी उसी दौर का है। इसका खामियाजा आज तक परिवार भुगत रहा है।
योजनाएं बनाम हकीकत
मध्य प्रदेश की राजनीति में महिलाएं अहम वोटर मानी जाती हैं। लाड़ली लक्ष्मी और लाड़ली बहना जैसी योजनाओं का खूब प्रचार हुआ,
लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि महिला सुरक्षा और गुमशुदगी रोकने के लिए ठोस सुधार नहीं किए गए।
सामाजिक कार्यकर्ता अर्चना सहाय कहती हैं कि समस्या सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सिस्टम की सोच से जुड़ी है।
प्रशासन अक्सर मान लेता है कि महिलाएं अपनी मर्जी से चली गई होंगी और वापस आ जाएंगी। यही लापरवाही मामलों को और गंभीर बना देती है।

