Saturday, January 31, 2026

UGC के नए नियमों पर रोक के बाद JNU में भड़काऊ नारेबाजी

JNU में फिर वामपंथियों ने उगला जहर

सुप्रीम कोर्ट द्वारा UGC के नए नियमों पर अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में वामपंथी छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किया। इस दौरान कैंपस में ढपली की ताल पर उकसाने वाले नारे लगाए गए और माहौल को तनावपूर्ण बनाया गया।

साबरमती ढाबे पर प्रदर्शन और नारे

JNU के साबरमती ढाबे पर आयोजित प्रदर्शन में ब्राह्मणवाद और सरकार के खिलाफ नारे लगाए गए।

वीडियो में प्रदर्शनकारी छात्रों को आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करते देखा गया, जिससे विश्वविद्यालय परिसर में एक बार फिर विवाद की स्थिति बनी।

पुतला दहन और आपत्तिजनक नारे

प्रदर्शन के दौरान ब्राह्मणवाद का पुतला जलाया गया। इसके साथ ही ब्राह्मण मुर्दाबाद, मनुवाद जलेगा और अन्य भड़काऊ नारे लगाए गए। सामने आए वीडियो में BJP और RSS के खिलाफ भी नारेबाजी साफ तौर पर सुनाई दी।

सुप्रीम कोर्ट की रोक का संदर्भ

यह नारेबाजी सुप्रीम कोर्ट के 29 जनवरी 2026 के आदेश के बाद हुई। कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर अंतरिम रोक लगाते हुए कहा कि संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों से जुड़े पहलुओं पर विस्तार से विचार आवश्यक है।

रोक से नाराज वामपंथी संगठन

अंतरिम रोक के फैसले से नाराज वामपंथी छात्र संगठनों ने इसे सरकार समर्थक कदम बताते हुए प्रदर्शन किया। इसी नाराजगी के तहत विश्वविद्यालय परिसर में सरकार और ब्राह्मणवाद के खिलाफ उग्र भाषा का प्रयोग किया गया।

पहले भी विवादों में रहा JNU

यह पहली बार नहीं है जब JNU में इस तरह की नारेबाजी हुई हो। बीते महीनों में भी सरकार विरोधी और विवादास्पद नारे लगाए जा चुके हैं, जिनमें राजनीतिक नेतृत्व के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ शामिल रही हैं।

वर्ष 2022 में भी सामने आए थे नारे

साल 2022 में भी JNU परिसर में ब्राह्मण विरोधी नारे लिखे गए थे। दीवारों पर उच्च जाति के हिंदुओं के खिलाफ धमकी भरे और उकसाने वाले संदेश सामने आए थे, जिनसे विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठे थे।

प्रोफेसरों के कक्षों तक पहुंची नारेबाजी

उस समय कुछ प्रोफेसरों के चैंबर के बाहर भी आपत्तिजनक नारे लिखे गए थे। हालिया प्रदर्शन में प्रयुक्त भाषा और प्रतीकों को उसी कड़ी से जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे JNU में बार बार उभरते विवादों की ओर ध्यान गया है।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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