Monday, February 23, 2026

खालिदा जिया का निधन, जब कट्टरपंथियों के हवाले कर दिया बांग्लादेश!

खालिदा जिया का निधन: बांग्लादेश की राजनीति की सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद शख्सियतों में शामिल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की अध्यक्ष और देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया का मंगलवार, 30 दिसंबर की सुबह निधन हो गया।

वे 80 वर्ष की थीं और लंबे समय से गंभीर बीमारियों से पीड़ित थीं। ढाका के एवरकेयर अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी पार्टी बीएनपी ने सोशल मीडिया के माध्यम से उनके निधन की पुष्टि की।

खालिदा जिया के निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति का एक लंबा अध्याय समाप्त हो गया है। दशकों तक सत्ता और विपक्ष की राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रही।

खालिदा जिया का निधन: जलपाईगुड़ी में हुआ जन्म

बेगम खालिदा जिया का जन्म 15 अगस्त 1945 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसिडेंसी के जलपाईगुड़ी जिले में हुआ था, जो आज पश्चिम बंगाल में है।

उनका बचपन का नाम खालिदा खानम ‘पुतुल’ था। 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उनका परिवार पूर्वी बंगाल, यानी तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान चला गया।

उन्होंने दिनाजपुर के मिशनरी स्कूल में शिक्षा ग्रहण की। खालिदा जिया खुद को “सेल्फ-एजुकेटेड” बताती थीं। राजनीति में आने से पहले उनका जीवन पूरी तरह घरेलू था।

कम उम्र में शादी, राजनीति से दूरी

साल 1960 में, महज 15 साल की उम्र में खालिदा जिया की शादी पाकिस्तानी सेना के अधिकारी जियाउर रहमान से हुई।

1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में जियाउर रहमान अहम भूमिका निभाने वाले नेताओं में रहे। बाद में वे देश के राष्ट्रपति बने।

इस दौर में खालिदा जिया एक गृहिणी के रूप में रहीं और अपने दो बेटों तारेक रहमान और आरफ रहमान की परवरिश में जुटी रहीं।

उन्हें राजनीति में कोई रुचि नहीं थी और वे सार्वजनिक जीवन से दूर रहीं।

राष्ट्रपति की हत्या ने बदली किस्मत

30 मई 1981 को चटगांव में एक असफल सैन्य विद्रोह के दौरान राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या कर दी गई।

यह घटना खालिदा जिया के जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई। उनके पति की मौत के बाद बीएनपी नेतृत्वविहीन हो गई और पार्टी टूटने के कगार पर पहुंच गई।

ऐसे हालात में खालिदा जिया ने राजनीति में कदम रखा। 1982 में वे बीएनपी से जुड़ीं और 1984 में पार्टी की चेयरपर्सन बनीं।

एक साधारण गृहिणी का देश की सबसे बड़ी नेता बनना बांग्लादेश की राजनीति में अभूतपूर्व था।

शेख हसीना के साथ मिलकर तानाशाही के खिलाफ आंदोलन

1980 के दशक में बांग्लादेश पर जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद का सैन्य शासन था।

खालिदा जिया ने शेख हसीना के साथ मिलकर तानाशाही के खिलाफ लोकतंत्र बहाली का आंदोलन चलाया।

हड़तालें, प्रदर्शन और जन आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और नजरबंद भी किया गया,

लेकिन 1990 में भारी जन दबाव के चलते इरशाद को सत्ता छोड़नी पड़ी और देश में लोकतंत्र की वापसी हुई।

पहली महिला प्रधानमंत्री

1991 में बांग्लादेश में पहली बार निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव हुए। बीएनपी ने जीत हासिल की और खालिदा जिया देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।

वे मुस्लिम बहुल देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गईं दुनिया की गिनी-चुनी महिला नेताओं में शामिल हुईं।

उनके पहले कार्यकाल में संसदीय लोकतंत्र बहाल हुआ, शिक्षा सुधार किए गए, लड़कियों की पढ़ाई को बढ़ावा मिला और विदेशी निवेश में इजाफा हुआ।

खालिदा के बेटे पर आरोप

1996 में वे चुनाव हार गईं, लेकिन 2001 में बीएनपी ने फिर सत्ता में वापसी की और खालिदा जिया दूसरी बार प्रधानमंत्री बनीं।

इस कार्यकाल में विकास कार्यों के साथ-साथ भ्रष्टाचार, आतंकवाद और कट्टरपंथ के आरोप भी लगे।

2004 में शेख हसीना पर हुए ग्रेनेड हमले ने दोनों नेताओं की दुश्मनी को और गहरा कर दिया। खालिदा जिया के बेटे तारेक रहमान पर भी गंभीर आरोप लगे।

राजनीति से निजी दुश्मनी तक

खालिदा जिया और शेख हसीना की प्रतिद्वंद्विता को दुनिया ‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ के नाम से जानती है। यह संघर्ष सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि वैचारिक और व्यक्तिगत भी था।

1991 से 2024 तक बांग्लादेश की राजनीति इन्हीं दो महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही। बार-बार हड़तालें, हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता इसी टकराव का नतीजा रहीं।

भारत विरोधी छवि और विदेश नीति

खालिदा जिया को भारत विरोधी नेता के रूप में देखा जाता रहा। उनकी नीति उनके पति जियाउर रहमान की “भारत से समान दूरी” वाली सोच पर आधारित थी। उनके शासन में पाकिस्तान और चीन से रिश्ते मजबूत हुए।

जेल और बीमारी

2007 के बाद खालिदा जिया पर भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज हुए। उन्हें जेल और नजरबंदी का सामना करना पड़ा। वे हमेशा कहती रहीं कि ये मामले राजनीतिक बदले की कार्रवाई हैं।

अंतिम वर्षों में वे लीवर सिरोसिस, डायबिटीज और दिल की बीमारियों से पीड़ित रहीं। 2024 में रिहाई के बाद वे राजनीति में लौटने की तैयारी कर रही थीं, लेकिन स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया।

बेगम खालिदा जिया के निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति में ‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ का दौर खत्म हो गया है। शेख हसीना निर्वासन में हैं और बीएनपी में अगली पीढ़ी नेतृत्व संभाल रही है।

बांग्लादेश अब एक नए राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ इतिहास की सबसे ताकतवर महिला नेताओं में से एक का सफर हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

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Madhuri
Madhurihttps://reportbharathindi.com/
पत्रकारिता में 6 वर्षों का अनुभव है। पिछले 3 वर्षों से Report Bharat से जुड़ी हुई हैं। इससे पहले Raftaar Media में कंटेंट राइटर और वॉइस ओवर आर्टिस्ट के रूप में कार्य किया। Daily Hunt के साथ रिपोर्टर रहीं और ETV Bharat में एक वर्ष तक कंटेंट एडिटर के तौर पर काम किया। लाइफस्टाइल, इंटरनेशनल और एंटरटेनमेंट न्यूज पर मजबूत पकड़ है।
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