Tuesday, January 27, 2026

जब इन्द्रेश कुमार ने ‘राम और न्याय’ की कहानी से बदल दिया माहौल

इन्द्रेश कुमार

संघ नेता इन्द्रेश कुमार के आगमन से उबल पड़ा परिसर

मूल जानकारी डॉ. पवन विजय के फेसबुक पोस्ट से ली गई है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज महाविद्यालय में जब बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती का समारोह आयोजित हुआ, तो आयोजकों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ नेता इन्द्रेश कुमार को बतौर वक्ता आमंत्रित किया।

जैसे ही उनका नाम सामने आया, कॉलेज का माहौल गर्म हो गया। छात्रों और वक्ताओं के एक वर्ग ने इस आमंत्रण का विरोध शुरू कर दिया। परिसर में “संघ मुर्दाबाद”, “ब्राह्मणवाद खत्म करो” और “मनुवाद के खिलाफ संघर्ष करो” जैसे नारे गूंजने लगे।

वातावरण इतना विषाक्त हो गया कि कार्यक्रम का विषय ही पीछे छूट गया। मंच पर आने वाले कई वक्ताओं ने सामाजिक समानता के नाम पर हिन्दू प्रतीकों पर तीखे हमले शुरू कर दिए।

“राम सामाजिक समरसता का प्रतीक नहीं”, एक वक्ता का विवादित बयान

एक वक्ता ने तो मंच से खुलेआम यह कह दिया, “We don’t accept Rama as a symbol of social harmony,” यानी “हम राम को सामाजिक समरसता का प्रतीक नहीं मानते।”

उनका तर्क था कि “आर्य राम ने अनार्य बालि का छिपकर वध किया था, इसलिए वह न्याय के प्रतीक नहीं हो सकते।” इस बयान ने माहौल को और भी भड़काया।

श्रोता दो खेमों में बंट गए, एक तरफ वे थे जो संघ और परंपरा का विरोध कर रहे थे, दूसरी ओर वे जो राम और उनके आदर्शों की मर्यादा पर हो रहे हमले से आहत थे। तभी मंच पर आए इन्द्रेश कुमार, और सभा की दिशा ही बदल गई।

इन्द्रेश कुमार का जवाब, “अगर बालि अनार्य था तो सुग्रीव क्या था?”

माइक संभालते ही इन्द्रेश कुमार ने उसी विषय से बात शुरू की। उन्होंने कहा, “मान लीजिए बालि अनार्य था, तो फिर सुग्रीव क्या था? वो भी अनार्य था।”

उन्होंने समझाया कि दोनों भाई एक ही समुदाय से थे और उनके बीच का विवाद व्यक्तिगत था, जातीय या वर्णगत नहीं।

इन्द्रेश कुमार ने विस्तार से बताया कि बालि ने अपने छोटे भाई सुग्रीव को न केवल राज्य से बेदखल किया, बल्कि उसकी पत्नी को भी अपने अधीन कर लिया।

सुग्रीव भय और अन्याय में जी रहा था, और त्रिलोक में कोई इतना साहसी नहीं था जो उसे न्याय दिला सके। तब राम ने उसका साथ दिया। उन्होंने बालि का वध किया, लेकिन इसके बाद जो हुआ, वही असली सबक है।

राम ने राज्य नहीं छीना, न्याय की स्थापना की

इन्द्रेश कुमार ने कहा, “बालि के वध के बाद राम ने स्वयं राज्य नहीं लिया। उन्होंने वही राज्य सुग्रीव को लौटाया, उसकी पत्नी रुमा को ससम्मान उसके पास भेजा।

इतना ही नहीं, बालि की पत्नी तारा को पटरानी बनाया और उसके पुत्र अंगद को सेनापति नियुक्त किया।”

उन्होंने जोर देकर कहा, “राम को आप सवर्ण कह लीजिए, मनुवादी कह लीजिए, पर सत्य यह है कि उन्होंने किसी की संपत्ति नहीं छीनी, किसी स्त्री का अपमान नहीं किया, और किसी बच्चे के अधिकार नहीं छिने।

राम का चरित्र न्याय की प्रतिमूर्ति है।” सभा में छाई गहरी खामोशी अब ताली और जयकारों में बदलने लगी थी।

“हनुमान भी अनार्य थे, तो कौन है ऐसा आर्य जो उन्हें नहीं पूजता?”

इन्द्रेश कुमार ने आगे सवाल किया, “अगर बालि अनार्य था तो हनुमान क्या थे? वे भी अनार्य थे। अब बताइए, भारत का कौन-सा आर्य है जिसके घर हनुमान की पूजा नहीं होती?”

उनका यह सवाल जैसे सभा में बिजली बनकर गिरा। श्रोता सन्न रह गए, और फिर अचानक नारे बदल गए।

अब ‘संघ विरोधी’ नारे नहीं, बल्कि ‘इन्द्रेश कुमार जिंदाबाद’ और ‘जय श्रीराम’ के जयकारे गूंजने लगे।

माहौल बदला, भीड़ उनके नाम के जयकारे में डूबी

भाषण खत्म होते-होते पूरा सभागार उनके पीछे खड़ा हो गया। जो भीड़ पहले विरोध में थी, वही अब उत्साह में बदल गई। आयोजकों ने उनसे कहा, “यह भीड़ आपके बोलने से पहले हमारी थी, अब आपकी है।”

कार्यक्रम के बाद सोशल मीडिया पर भी चर्चा छिड़ गई, “संघ का नाम सुनकर जो भीड़ भड़क उठी थी, उसे शांत करने के लिए शब्द नहीं, दृष्टिकोण चाहिए था, और इन्द्रेश कुमार ने वही दिया।”

वंचित समाज से जुड़ने का आह्वान

अपने भाषण के अंत में इन्द्रेश कुमार ने कहा, “वंचित समाज से दूरी नहीं, जुड़ाव जरूरी है। उनके भीतर सदियों से जो जहर और अलगाव भरा गया है, उसे सिर्फ संवाद से मिटाया जा सकता है।”

उन्होंने चेताया कि जब हम उनके पास नहीं जाते, तो उनके बीच पहले इस्लाम और ईसाई मिशनरी पहुँच जाते हैं।

विकार-उल-मुल्क जैसे लोगों की कुटिल मांगें अब आकार ले चुकी हैं, और इस विष बेल को बढ़ने से रोकना हमारी जिम्मेदारी है।

“भीमटा कहकर अपमान मत कीजिए, इतिहास का सत्य बताइए”

इन्द्रेश कुमार ने कहा, “उन्हें भीमटा कहकर अपमान मत करिए। उन्हें बताइए कि हमारे हिन्दू समाज में जाति आधारित ऊँच-नीच नहीं थी। यही समाज था जिसमें शबरी माता के जूठे बेर श्रीराम ने खाए, निषादराज केवट उनके सखा बने और सुग्रीव उनके साथी थे।”

उन्होंने कहा कि भारत पर दुर्भाग्य की छाया तब पड़ी जब विस्तारवादी मजहब यहाँ आए और समाज को तोड़ने लगे। यह अंधकार तभी समाप्त होगा जब हम अपने भीतर एकता को पहचानेंगे और बाहरी चालों से सावधान रहेंगे।

“राम का न्याय ही हिंदू समाज की रीढ़ है”

हंसराज कॉलेज का वह दिन केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि एक दृष्टिकोण का पुनर्जागरण था। इन्द्रेश कुमार ने दिखाया कि राम कोई वर्ग या जाति के नहीं, बल्कि न्याय के प्रतीक हैं।

उनका संदेश स्पष्ट था, “भारत का उत्थान तभी होगा जब हम अपने समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलेंगे और दूसरों की विभाजनकारी राजनीति को अस्वीकार करेंगे।”

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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