इन्द्रेश कुमार
मख़मूर सईदी का एक बेहद मकबूल शेर है जो इतिहास और व्यक्तित्व के द्वंद्व को बड़ी खूबसूरती से बयां करता है कि “कुछ लोग थे कि जो वक़्त के सांचे में ढल गए, कुछ लोग थे कि जिनसे वक़्त के सांचे बदल गए।”
जब हम समकालीन भारत के सामाजिक और राष्ट्रवादी पटल पर दृष्टि डालते हैं, तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के सदस्य डॉ. इन्द्रेश कुमार का व्यक्तित्व इसी शेर की दूसरी पंक्ति को चरितार्थ करता हुआ दिखाई देता है।
एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने समय के प्रवाह के साथ बहने की बजाय, समय की धारा को राष्ट्रहित की ओर मोड़ने का भगीरथ प्रयास किया है। सम्राटों जैसा ओजस्वी व्यक्तित्व और ऋषियों जैसी सादगी, इन दोनों का अद्भुत संगम उनके जीवन में देखने को मिलता है।
विरोधियों द्वारा कभी-कभी कटाक्ष में ‘मौलाना इन्द्रेश’ कहे जाने वाले इस राष्ट्र-साधक ने वास्तव में भारत की एकात्मता के लिए जो कार्य किया है, वह किसी सामान्य राजनेता या सामाजिक कार्यकर्ता की कल्पना से परे है।
त्याग और प्रारंभिक जीवन
भारतीय संस्कृति में त्याग को भोग से सदैव ऊपर रखा गया है, और इन्द्रेश कुमार जी का जीवन इसी त्याग की जीवंत मिसाल है। 18 फरवरी 1949 को पंजाब के समाना में एक अत्यंत समृद्ध और प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार में इनका जन्म हुआ था।
इनके पिता जनसंघ के जमाने में विधायक हुआ करते थे और परिवार का सामाजिक रसूख ऐसा था कि किसी भी भौतिक सुख-सुविधा की कोई कमी नहीं थी। हरियाणा के कैथल शहर के सबसे धनाढ्य परिवारों में से एक होने के बावजूद, बालक इन्द्रेश का मन विलासिता में नहीं बल्कि राष्ट्र-आराधना में रमा।
मात्र 10 वर्ष की कोमल आयु में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाना शुरू कर दिया था, जहाँ से उनके भीतर अनुशासन और देशभक्ति के बीज पड़े।
यह वह दौर था जब देश अपनी स्वतंत्रता के शैशवकाल में था और राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित युवाओं की महती आवश्यकता थी।
शिक्षा के क्षेत्र में भी उनकी मेधा का कोई सानी नहीं था। उन्होंने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ़ से बी.टेक (मैकेनिकल इंजीनियरिंग) की पढ़ाई की और अपनी कुशाग्र बुद्धि का लोहा मनवाते हुए पूरे बैच में स्वर्ण पदक (गोल्ड मेडल) प्राप्त किया।
आज के दौर में जब युवा इंजीनियरिंग की डिग्री हाथ में आते ही मल्टीनेशनल कंपनियों के पैकेज और विदेश जाने के सपने देखने लगते हैं, उस समय 1970 में इस स्वर्ण पदक विजेता युवक के सामने भी दो स्पष्ट मार्ग थे। एक तरफ पारिवारिक व्यवसाय और आरामदायक जीवन था, तो दूसरी तरफ कांटों भरा राष्ट्र-सेवा का पथ।
उन्होंने दूसरा मार्ग चुना और 16 जुलाई 1970 को अपना सम्पूर्ण जीवन मां भारती के चरणों में समर्पित करते हुए संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। यह बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण जैसा ही एक संकल्प था, जिस पर उनके पिता ने गर्व करते हुए पूरे मोहल्ले में भोज दिया था कि उनका बेटा अब केवल उनका नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का हो गया है।
दिल्ली का कालखंड और आपातकाल का संघर्ष
प्रचारक जीवन की शुरुआत में संघ ने उन्हें देश की राजधानी दिल्ली में कार्य करने का दायित्व सौंपा। वर्ष 1970 से 1983 तक, लगभग 13 वर्षों तक वे दिल्ली में सक्रिय रहे। यह वह कालखंड था जब भारतीय राजनीति और समाज अपने सबसे उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रहा था।
1975 का आपातकाल, जब लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा था और राष्ट्रवादी शक्तियों को जेलों में ठूंसा जा रहा था, तब इन्द्रेश जी ने भूमिगत रहकर संगठन को जीवित रखने और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए अथक परिश्रम किया।
इसके पश्चात 1984 के सिख विरोधी दंगों की विभीषिका में भी उन्होंने पीड़ित समाज को संबल देने का कार्य किया। उनकी संगठन क्षमता और जुझारूपन का एक बड़ा उदाहरण दिल्ली के ऐतिहासिक माँ झंडेवाली मंदिर की मुक्ति है।
उन्होंने असामाजिक तत्वों के कब्जे से इस पवित्र धर्मस्थल की जमीन को मुक्त करवाकर उसे समाज को पुनः समर्पित किया, जो उनकी धर्मरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
कश्मीर की घाटी में राष्ट्रवाद की मशाल
दिल्ली में उनकी असाधारण योग्यता को देखते हुए संघ नेतृत्व ने उन्हें एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण और दुर्गम दायित्व सौंपा। उन्हें नब्बे के दशक की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में संघ कार्य के विस्तार के लिए भेजा गया।
यह वह समय था जब कश्मीर घाटी आतंकवाद की आग में जल रही थी, और कश्मीरी पंडितों का दर्दनाक पलायन शुरू हो चुका था। जब देश के बड़े-बड़े राजनेता और अधिकारी कश्मीर के हालात के सामने घुटने टेक चुके थे और केवल किसी चमत्कार की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब इन्द्रेश कुमार वहां के गांवों में बिना किसी सरकारी सुरक्षा के घूम रहे थे।
वे वहां के संतप्त हिंदू समाज के बीच एक चट्टान की तरह खड़े रहे और उन्हें यह विश्वास दिलाते रहे कि पूरा देश उनके साथ खड़ा है।
आतंकवादियों ने कई बार उनके अपहरण और हत्या की योजनाएं बनाईं, उन्हें धमकियां भेजी गईं, लेकिन वे अपने पथ से एक इंच भी नहीं डिगे। कश्मीर में अपने 17 वर्षों के लंबे कार्यकाल के दौरान उन्होंने न केवल हिंदुओं का मनोबल बढ़ाया, बल्कि आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए ग्राम और नगर स्तर पर सुरक्षा समितियों का गठन भी किया।
जम्मू-कश्मीर के विस्थापितों के लिए पुनर्वास शिविरों की स्थापना और उनकी आवाज को राष्ट्रीय पटल पर रखने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही है।
आज यदि कश्मीर में राष्ट्रवाद की आवाज बुलंद है, तो उसकी नींव में इन्द्रेश जी द्वारा उस कठिन दौर में किया गया परिश्रम ही है। उन्होंने वहां एक-एक इंच भूमि पर भारत माता के जयकारे को जीवित रखने के लिए अपने प्राणों को हथेली पर रखकर कार्य किया।
संस्थाओं के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का महायज्ञ
सामान्यतः एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में एक या दो संगठनों से जुड़ पाता है, लेकिन डॉ. इन्द्रेश कुमार ने राष्ट्रहित के विभिन्न आयामों को छूने वाले अनेकों संगठनों की न केवल स्थापना की, बल्कि उन्हें वटवृक्ष का रूप भी दिया।
उनकी कार्यशैली की विशेषता यह है कि वे समस्या का केवल विश्लेषण नहीं करते, बल्कि उसका संस्थागत समाधान प्रस्तुत करते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा हो, सीमा प्रबंधन हो, पर्यावरण हो या सामाजिक समरसता, उन्होंने हर क्षेत्र के लिए एक समर्पित मंच तैयार किया है।
सीमा सुरक्षा और सामाजिक जागरण
राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सेना का दायित्व नहीं है, बल्कि समाज की भी इसमें सक्रिय भूमिका होनी चाहिए, इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने ‘सीमा जागरण मंच’ की स्थापना की।
उनका मानना था कि सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाला नागरिक देश का प्रहरी है। इसके साथ ही, देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के प्रति बौद्धिक वर्ग और आम जनमानस को जागरूक करने के लिए उन्होंने ‘फैन्स’ (फोरम फॉर अवेयरनेस ऑन नेशनल सिक्यूरिटी – FANS) और ‘फिन्स’ (फोरम फॉर इंटीग्रेटेड नेशनल सिक्यूरिटी – FINS) जैसे संगठनों का ताना-बाना बुना।
इन मंचों के माध्यम से आज देश के रक्षा विशेषज्ञ, पूर्व सैनिक और नीति निर्माता एक साथ आकर राष्ट्र की सुरक्षा चुनौतियों पर मंथन करते हैं। उन्होंने युवाओं को सीमाओं से जोड़ने के लिए ‘सरहद को प्रणाम’ जैसी यात्राओं की शुरुआत की, जिसमें लाखों युवक-युवतियां देश की सीमाओं तक जाकर सैनिकों के त्याग को नमन करते हैं।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और पर्यावरण
भारत की सांस्कृतिक अखंडता और पर्यावरण संरक्षण के लिए भी उनके प्रयास स्तुत्य हैं। जब सिंधु नदी, जो हमारी सभ्यता का पालना है, को लोग भूलने लगे थे, तब उन्होंने लेह-लद्दाख में ‘सिंधु दर्शन यात्रा’ की शुरुआत करवाई।
1996 में शुरू हुए ‘सिंधु उत्सव’ ने न केवल लद्दाख को शेष भारत से जोड़ा, बल्कि कैलाश मानसरोवर की मुक्ति के संकल्प को भी दोहराया। इसी प्रकार, पूर्वोत्तर भारत को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए उन्होंने ‘तवांग यात्रा’ और ‘परशुराम कुंड यात्रा’ का सूत्रपात किया।
हिमालय क्षेत्र की पारिस्थितिकी और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने ‘हिमालय परिवार’ नामक संगठन खड़ा किया, जो आज वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। माँ गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए भी उन्होंने अनेक अभियान चलाए हैं।
सामाजिक समरसता के नए आयाम
इन्द्रेश जी के व्यक्तित्व का सबसे विलक्षण पहलू सामाजिक समरसता के क्षेत्र में उनका कार्य है। उन्होंने उन वर्गों के साथ संवाद स्थापित किया, जिन्हें पारंपरिक रूप से संघ विचार के विपरीत माना जाता था।
देश के मुस्लिम समाज को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने और विवादित मुद्दों पर सार्थक संवाद के लिए उन्होंने 2002 में ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ की स्थापना की। यह एक साहसिक कदम था, जिसने रूढ़ियों को तोड़ते हुए लाखों मुसलमानों को राष्ट्रवाद के विचार से जोड़ा।
उनकी प्रेरणा से मुस्लिम समाज ने गौ-हत्या के विरोध में एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया और लगभग 10 लाख हस्ताक्षर महामहिम राष्ट्रपति को सौंपे। इसी प्रकार, ईसाई समाज के साथ संवाद के लिए ‘राष्ट्रीय ईसाई मंच’ और बौद्ध समाज के लिए ‘धर्म-संस्कृति संगम’ की स्थापना की। उनका यह प्रयास बताता है कि वे ‘जोड़ने’ की राजनीति करते हैं, तोड़ने की नहीं।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और पड़ोसी देशों से सम्बन्ध
भारत के पड़ोसी देशों के साथ सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों को प्रगाढ़ करने में भी उनकी दृष्टि अत्यंत स्पष्ट रही है। नेपाल, जो भारत का सांस्कृतिक सहोदर है, वह चीन के प्रभाव में न चला जाए, इसके लिए उन्होंने 2006 में ‘नेपाली संस्कृति परिषद्’ का गठन किया।
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाने और वहां के बुद्धिजीवियों को साथ लाने के लिए उन्होंने ‘भारत-बांग्लादेश मैत्री परिषद्’ की नींव रखी। तिब्बत की स्वतंत्रता भारत की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है, इस बात को समझते हुए उन्होंने 5 मई 1999 को ‘भारत तिब्बत सहयोग मंच’ बनाया।
ये संगठन केवल नाम के लिए नहीं हैं, बल्कि ये भारत की सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी (Soft Power Diplomacy) के अनौपचारिक राजदूत के रूप में कार्य कर रहे हैं।
अद्भुत कार्यक्षमता और विराट व्यक्तित्व
डॉ. इन्द्रेश कुमार की दिनचर्या और कार्यक्षमता किसी सामान्य मनुष्य के लिए आश्चर्य का विषय हो सकती है। जो लोग उन्हें करीब से जानते हैं, वे बताते हैं कि उनका जीवन एक निरंतर यात्रा है।
सुबह गुवाहाटी में कार्यक्रम, दोपहर में दिल्ली और शाम को हैदराबाद, ऐसी व्यस्तता उनके लिए सामान्य बात है। उन्होंने भारत भ्रमण के इतने चक्र पूरे किए हैं कि शायद ही देश का कोई कोना उनके चरणों से अछूता रहा हो।
उनकी स्मरण शक्ति विलक्षण है; वे प्रतिदिन हजारों लोगों से मिलते हैं, लेकिन जिससे एक बार मिल लेते हैं, उसका नाम और संदर्भ उन्हें वर्षों बाद भी याद रहता है। यही कारण है कि उनके संपर्क में आने वाला व्यक्ति स्वतः ही उनके प्रति आदर भाव से भर जाता है।
एक वरिष्ठ प्रचारक और अखिल भारतीय अधिकारी के रूप में आज भी उनकी सक्रियता युवाओं को लज्जित करने वाली है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और संकल्प दृढ़ हो, तो एक अकेला व्यक्ति भी संस्थाओं का निर्माण कर सकता है और इतिहास की धारा बदल सकता है।
उन्होंने न केवल संगठनों के ढांचे खड़े किए, बल्कि उनमें प्राण भी फूंके। ‘बूढ़ा अमरनाथ यात्रा’ की शुरुआत करके उन्होंने पूंछ जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जिहादी मानसिकता को करारा जवाब दिया, जो यह कहते थे कि ‘निजामे-मुस्तफा’ में हिंदुओं का कोई स्थान नहीं है।
इसी तरह हिमाचल में ‘बाबा बालकनाथ दियोट सिद्ध हिमालयी एकता’ यात्रा का प्रारंभ भी उनकी दूरगामी सोच का परिणाम है।
डॉ. इन्द्रेश कुमार केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि विचार और कर्म के एक संस्थान हैं। इंजीनियरिंग के स्वर्ण पदक विजेता से लेकर राष्ट्र-निर्माण के शिल्पी बनने तक की उनकी यात्रा, त्याग, तपस्या और दूरदर्शिता की एक महागाथा है।
आज जब देश ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के पथ पर अग्रसर है, तो हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि इस मार्ग को प्रशस्त करने में इन्द्रेश कुमार जैसे मूक साधकों ने अपना सम्पूर्ण जीवन होम कर दिया है।
उनके द्वारा रोपे गए संगठनों के पौधे आज वटवृक्ष बनकर देश की सुरक्षा, संस्कृति और समरसता को छाया प्रदान कर रहे हैं। उनका जीवन हम सभी के लिए एक प्रेरणा है कि राष्ट्रभक्ति केवल नारा नहीं, बल्कि जीने की एक पद्धति है।
जब इन्द्रेश कुमार ने ‘राम और न्याय’ की कहानी से बदल दिया माहौल

