टेरिफ युद्ध के बीच भारत सरकार ने जिस संयम का प्रदर्शन किया है, उसने अमेरिका को गहरी खीज में डाल दिया है।
न तो भारत टेरिफ हटाने के लिए गिड़गिड़ाया है और न ही उसने अमेरिकी प्रस्तावों का कोई जवाब दिया है।
जर्मन मीडिया का कहना है कि ट्रम्प के फोन कॉल को अनदेखा करना भारत की एक सुनियोजित रणनीति और अप्रत्यक्ष ‘मौन झापड़’ के समान है।
इंडो-पैसिफिक में भारत की ताकत का डर
ट्रम्प प्रशासन के अधिकारी जिस तरह से बौखलाहट में बयान दे रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि अमेरिका को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अकेला पड़ने का भय सता रहा है।
भारत ही वह शक्ति है जो अंडमान स्थित नौसैनिक अड्डे से मलक्का जलडमरूमध्य को नियंत्रित कर चीन की लगभग 70% तेल आपूर्ति रोकने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि वॉशिंगटन भारत की चुप्पी से परेशान है।
आर्थिक नुकसान और रणनीतिक बढ़त
निस्संदेह भारत को टेरिफ युद्ध के कारण आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, किंतु इसके बरक्स एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की स्थिति और अधिक कमजोर होती दिखाई दे रही है।
अमेरिकी अधिकारियों की हताशा और ऊंची आवाज़ें इस बात का संकेत हैं कि असली नुकसान किसे अधिक हो रहा है।
भारत की चुप्पी ही जवाब
अमेरिकी अधिकारियों की धमकियां, “भारत ट्रम्प के फोन का जवाब दे वरना ठीक नहीं होगा”, सुनने में भले आक्रामक लगें, लेकिन भारत का जवाब वही है, मौन।
यह मौन मानो ट्रम्प को तिरस्कारपूर्ण मुस्कान के साथ यह कह रहा हो, “जा नहीं बोलता, जो उखाड़ना है उखाड़ ले।”