Thursday, February 5, 2026

​चिकित्सा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और वैश्विक महाशक्ति बनने की ओर बढ़ते भारत के कदम

चिकित्सा क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार

​भारत में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का परिदृश्य पिछले कुछ दशकों में एक विरोधाभासी स्थिति से गुजरा है।

एक ओर जहाँ हमारे देश के मेधावी छात्र चिकित्सा की पढ़ाई के लिए चीन, रूस, कजाकिस्तान, यूक्रेन और फिलीपींस जैसे देशों की ओर पलायन करने को विवश होते रहे हैं, वहीं दूसरी ओर देश के भीतर मेडिकल सीटों की कृत्रिम कमी ने एक ऐसे कुचक्र को जन्म दिया जिसने न केवल हमारी आर्थिक संप्रदा को निचोड़ा, बल्कि हमारी बौद्धिक क्षमता का भी ह्रास किया है।

यह विडंबना ही है कि जिस भारत ने सुश्रुत और चरक के रूप में शल्य चिकित्सा और आयुर्वेद का ज्ञान पूरी दुनिया को दिया, उसी देश के युवा आज गुमनाम विदेशी विश्वविद्यालयों में एमबीबीएस और एमडी की डिग्रियाँ हासिल करने के लिए भटक रहे हैं।

इन देशों में जाने वाले छात्र अक्सर उन परिवारों से आते हैं जो अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपनी जीवन भर की कमाई दांव पर लगा देते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, एक-एक छात्र पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, और यह राशि अंततः भारत की अर्थव्यवस्था से बाहर जाकर दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करती है।

यह केवल शिक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय पूंजी के पलायन का एक गंभीर आर्थिक मुद्दा भी है, जिस पर लंबे समय तक नीतिगत स्तर पर चुप्पी साधी गयी थी।

​विदेशी डिग्री का मोह और एफएमजीई की कड़वी सच्चाई

​विदेशी धरती से डॉक्टर बनकर लौटने का सपना देखने वाले इन लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए वास्तविकता अक्सर अत्यंत कठोर होती है। जब ये छात्र अपनी डिग्री लेकर भारत लौटते हैं और यहाँ मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए अनिवार्य ‘फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट्स एग्जामिनेशन’ (FMGE) में बैठते हैं, तो सफलता के आंकड़े चौंकाने वाले होते हैं।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, विदेश से पढ़कर आने वाले छात्रों में से महज 05 प्रतिशत ही इस स्क्रीनिंग परीक्षा को उत्तीर्ण कर पाते हैं। शेष 95 प्रतिशत छात्र, जिनके अभिभावकों ने उनकी पढ़ाई पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए, वे न तो घर के रहते हैं और न घाट के।

यह स्थिति एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है कि क्या हम शिक्षा के नाम पर अपने युवाओं को एक ऐसे अंधकुएं में धकेल रहे थे जहाँ से वापसी का रास्ता बेहद संकरा है? सरकार द्वारा हाल के वर्षों में किए गए नीतिगत बदलाव इसी विसंगति को दूर करने का एक साहसिक प्रयास हैं।

सरकार को यह समझ आ चुका है कि मेडिकल सीटों की संख्या को कृत्रिम रूप से कम रखकर और ‘गुणवत्ता’ की दुहाई देकर हम केवल अपने देश का पैसा विदेश भेज रहे हैं और बदले में हमें अकुशल मानव संसाधन प्राप्त हो रहा है। हर साल लाखों करोड़ रुपये का यह आर्थिक घाटा किसी भी विकासशील राष्ट्र के लिए असहनीय है।

​इस परिप्रेक्ष्य में, नीट (NEET) परीक्षा की कट-ऑफ को घटाना और देश के भीतर मेडिकल कॉलेजों की संख्या में भारी वृद्धि करना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

सरकार ने यह निर्णय लिया है कि दस-पंद्रह हजार करोड़ रुपये का निवेश करके अगर मेडिकल कॉलेज खोले जाएं, तो इससे हर साल विदेशों में बर्बाद होने वाले एक लाख करोड़ रुपये बचाए जा सकते हैं।

यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ की संकल्पना का ही विस्तार है, जहाँ हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी क्षमता का विस्तार कर रहे हैं। जिस प्रकार भारत ने नर्सिंग के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है और आज भारतीय नर्सें पूरी दुनिया में सेवा दे रही हैं, उसी प्रकार आने वाले समय में भारत मध्य एशिया और अफ्रीकी देशों के लिए डॉक्टरों की आपूर्ति का सबसे बड़ा स्रोत बन सकता है।

यह एक दूरदर्शी सोच है जो न केवल भारत की स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करेगी, बल्कि ‘हील इन इंडिया’ और ‘हील बाय इंडिया’ के मंत्र को भी वैश्विक पटल पर स्थापित करेगी।

​गुणवत्ता का विलाप और बाजार के तर्क का सत्य

​जब भी मेडिकल सीटों की संख्या बढ़ाने या कट-ऑफ कम करने की बात आती है, तो एक विशेष वर्ग द्वारा ‘गुणवत्ता’ (Quality) के गिरते स्तर का रोना रोया जाने लगता है।

यह वही वर्ग है जो दशकों से चिकित्सा शिक्षा पर कुंडली मारकर बैठा था और जिसने शिक्षा को एक विशेषाधिकार बना दिया था। यहाँ इंजीनियरिंग शिक्षा का उदाहरण अत्यंत प्रासंगिक है।

एक समय था जब देश में इंजीनियरिंग कॉलेजों की बाढ़ आ गई थी और हर गली-मोहल्ले में बी.टेक की डिग्री देने वाले संस्थान खुल गए थे। उस समय भी यही शोर मचा था कि इससे इंजीनियरिंग की गुणवत्ता खत्म हो जाएगी।

लेकिन क्या आज आईआईटी (IIT) या एनआईटी (NIT) जैसे शीर्ष संस्थानों का महत्व कम हो गया है? उत्तर है, बिल्कुल नहीं। बाजार ने अपनी छंटनी खुद कर ली। जिन संस्थानों में गुणवत्ता नहीं थी, वे धीरे-धीरे बंद हो गए और जहाँ गुणवत्ता थी, वे आज भी शान से खड़े हैं।

इंजीनियरिंग क्षेत्र में आई उस क्रांति ने भारत को हर श्रेणी का तकनीकी मानव संसाधन उपलब्ध कराया, जिसने भारत को आईटी सुपरपावर बनाने में महती भूमिका निभाई।

ठीक उसी तरह, चिकित्सा शिक्षा के विस्तार से भी घबराने की आवश्यकता नहीं है। बाजार की शक्तियाँ (Market Forces) स्वयं गुणवत्ता का निर्धारण कर लेंगी।

​जो लोग आज यह तर्क दे रहे हैं कि कम कट-ऑफ पर प्रवेश लेने वाले डॉक्टर अयोग्य होंगे, वे इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि प्रवेश प्रक्रिया केवल एक द्वार है। असली परीक्षा तो पढ़ाई के दौरान और उसके बाद होती है।

चाहे कोई छात्र आरक्षण से प्रवेश ले या कम कट-ऑफ पर, पास होने के लिए उसे भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ती है और उतनी ही परीक्षाएं उत्तीर्ण करनी पड़ती हैं जितनी एक टॉपर छात्र को।

इसके अलावा, असली परीक्षा तो डिग्री मिलने के बाद ‘बाजार’ के कुरुक्षेत्र में होती है। एक ही शहर में एक ही विभाग के सैकड़ों डॉक्टर होते हैं। उनमें से किसी के पास मरीजों की इतनी भीड़ होती है कि महीनों की वेटिंग चलती है, जबकि किसी दूसरे के पास मरीज भटकते भी नहीं हैं।

मरीज केवल डिग्री नहीं देखता, वह डॉक्टर की उपलब्धता, उसका व्यवहार, उसका समर्पण और उसके हाथ का यश देखता है। इसलिए, गुणवत्ता की चिंता करने वालों को यह समझना होगा कि प्रतिस्पर्धा ही गुणवत्ता की सबसे बड़ी कसौटी है।

जब डॉक्टरों की संख्या बढ़ेगी, तो उन्हें अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए और अधिक परिश्रम करना होगा, जिससे अंततः लाभ मरीज और समाज को ही होगा।

​स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत और भविष्य की संभावनाएं

​आज भारत के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की जो स्थिति है, वह किसी से छिपी नहीं है। बड़े-बड़े अस्पतालों में आपातकालीन चिकित्सा अधिकारी (EMO) के रूप में अक्सर आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक चिकित्सक अपनी सेवाएँ देते हैं और वे यह कार्य पूरी जिम्मेदारी और कुशलता से निभाते हैं।

कई बार तो यह भी देखा गया है कि अनुभवी टेक्निशियन या कंपाउंडर भी सुदूर इलाकों में प्राथमिक उपचार की जिम्मेदारी संभाल रहे होते हैं। यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि हमारे पास एलोपैथिक डॉक्टरों की भारी कमी थी। जो डॉक्टर उपलब्ध थे, वे शहरों से बाहर निकलना नहीं चाहते थे।

ऐसे में, यदि मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ती है और हर साल बड़ी संख्या में डॉक्टर निकलते हैं, तो इससे न केवल शहरों में बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित होगी।

जब आपूर्ति बढ़ेगी, तो डॉक्टर सुदूर क्षेत्रों में जाने के लिए भी प्रेरित होंगे, जिससे देश के अंतिम जन तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुँच सकेंगी।

​भविष्य के भारत की तस्वीर को यदि हम आर्थिक चश्मे से देखें, तो स्वास्थ्य क्षेत्र में विकास की असीम संभावनाएं हैं। वर्तमान में भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का महज 3-4 प्रतिशत ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है।

यदि हमें 2050 तक एक विकसित राष्ट्र बनना है, तो यह खर्च स्वाभाविक रूप से बढ़कर 10-12 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा। इसका सीधा अर्थ है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में अभी भी कई गुना वृद्धि की गुंजाइश है। इसके अतिरिक्त, भारत की जीडीपी स्वयं भी अगले कुछ दशकों में कई गुना बढ़ने वाली है।

इस प्रकार, स्वास्थ्य क्षेत्र में कुल वृद्धि 8 से 10 गुना तक हो सकती है। इतनी विशाल मांग को पूरा करने के लिए हमें आज से ही तैयारी करनी होगी। हमारे पास विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी है।

इस जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का उपयोग हमें न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए करना होगा।

​यूरोप, अमेरिका और कनाडा में भारतीय डॉक्टर पहले ही अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। अब अगला पड़ाव मध्य एशिया, अफ्रीका और अन्य विकासशील देश हैं।

पश्चिमी देशों के डॉक्टर इन क्षेत्रों में जाने से कतराते हैं, और न ही वहाँ की जलवायु और परिस्थितियों में वे लंबे समय तक टिक सकते हैं। ऐसे में, भारतीय डॉक्टर ही एकमात्र विकल्प हैं जो अपनी सहनशीलता, अनुकूलन क्षमता और सेवा भाव के कारण इन देशों में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ बन सकते हैं।

सरकार द्वारा मेडिकल सीटों को बढ़ाने का निर्णय इसी वैश्विक दृष्टि का परिचायक है। जो लोग आज ‘अनायास भय’ (Fear Mongering) का वातावरण बना रहे हैं कि इससे डॉक्टरों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा, वे वास्तव में अपने ‘कम्फर्ट जोन’ के छिन जाने से भयभीत हैं।

जब आपूर्ति बढ़ेगी, तो स्वास्थ्य सेवाएं सस्ती होंगी और आम आदमी की पहुँच में होंगी, जो कि किसी भी कल्याणकारी राज्य का अंतिम लक्ष्य होता है। अतः हमें इस परिवर्तन का स्वागत करना चाहिए और इसे एक अवसर के रूप में देखना चाहिए, न कि एक संकट के रूप में।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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