Saturday, January 31, 2026

मैकियावेली की प्रयोगशाला बना भारत, जलते विश्वविद्यालय, मौन सत्ता और ‘प्रायोजित’ गृहयुद्ध

मैकियावेली की प्रयोगशाला

यूजीसी गाइडलाइंस-2026 और भारतीय समाज का विखंडन

अगर निकोलो मैकियावेली आज जीवित होते और 2026 के भारत की ओर देखते, तो संभवतः उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान होती। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द डिस्कोर्सेस’ में जिस “Utility of Tumults” (संघर्ष की उपयोगिता) का सिद्धांत दिया था, उसका इससे बेहतर, जीवंत और भयानक मंचन शायद ही इतिहास में कहीं और हुआ हो।

आज देश के दो प्रतिष्ठित संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय BHU और JNU शिक्षा के मंदिर कम और विचारधाराओं के ‘वार-रूम’ ज्यादा लग रहे हैं। एक तरफ SC/ST/OBC वर्ग के छात्र हैं जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी की नई गाइडलाइंस पर रोक लगाने का विरोध कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ सामान्य वर्ग के छात्र हैं जो सुप्रीम कोर्ट के समर्थन में विजय जुलूस निकाल रहे हैं।

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वाराणसी में BHU के सिंह द्वार पर दोनों गुटों के बीच जो हाथापाई और ‘लड़ने की नौबत’ आई है, वह महज छात्रों का झगड़ा नहीं है, वह उस ‘नियंत्रित अराजकता’ (Controlled Anarchy) का परिणाम है जिसे सत्ता के गलियारों में बड़ी बारीकी से डिज़ाइन किया गया है।

कुटिल नीति का चक्रव्यूह: संविधान का उल्लंघन और सत्ता का ‘मौन’

मामले की जड़ में यूजीसी (UGC) द्वारा जारी ‘गाइडलाइंस-2026’ हैं। क्या यह महज संयोग था कि देश की सर्वोच्च शैक्षणिक नियामक संस्था ऐसे नियम बनाए जो ‘सामान्य न्याय’ (Natural Justice) और संविधान के ‘मूल ढांचे’ के ही खिलाफ हों?

विधि के सामान्य छात्र भी यह बता सकते थे कि ये नियम सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर एक दिन भी नहीं टिकेंगे। सवाल यह है कि एक संवैधानिक संस्था ऐसे नियम क्यों बनाएगी जो प्रथम दृष्टया ही अवैध हों? यहीं पर मैकियावेली का ‘छल’ (Deception) काम आता है।

सरकार और यूजीसी को भली-भांति पता था कि ये नियम सुप्रीम कोर्ट में नहीं टिकेंगे। फिर भी उन्हें लागू किया गया और सत्ता ने अपनी ‘रणनीतिक चुप्पी’ साध ली। यह चुप्पी कोई प्रशासनिक मजबूरी नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा राजनीतिक हथियार थी। पर जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने इन विभाजनकारी नियमों पर रोक लगाई, सब बधाई देने आ गए।

श्रेय की लूट और ‘भ्रम’ का साम्राज्य

सबसे खतरनाक खेल अब शुरू होता है। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद सरकार के कुछ छुटभैया नेताओं ने एक अद्भुत नैरेटिव गढ़ दिया:

  1. आरक्षित वर्ग के लिए संदेश: “देखिए, सरकार तो आपके लिए ये क्रांतिकारी नियम लाई थी, लेकिन कोर्ट ने रोक दिया। हम तो आपके हितैषी हैं, न्यायपालिका ही अड़ंगा लगा रही है।”
    • परिणाम: पिछड़ा वर्ग सरकार को अपना मसीहा और कोर्ट/सामान्य वर्ग को विलेन मान रहा है।

और,

  1. सामान्य वर्ग के लिए संदेश: “घबराइए मत, व्यवस्था अभी भी काम कर रही है। कोर्ट ने आपको बचा लिया।” (और परोक्ष रूप से, सरकार ने ही कोर्ट का सम्मान करते हुए कदम पीछे खींचे हैं)।
    • परिणाम: सामान्य वर्ग सरकार से नाराज होकर भी ‘विकल्पहीनता’ में फंसा है और अपना पूरा गुस्सा आरक्षित वर्ग पर निकाल रहा है।

यह वही स्थिति है जिसका जिक्र मैकियावेली ने किया था, “जनता को आपस में इतना उलझा दो कि वे कभी राजा की तरफ उंगली न उठा सकें।” आज बीएचयू और जेएनयू में छात्र एक-दूसरे का कॉलर पकड़े खड़े हैं, जबकि जिस सरकार ने यह आग लगाई, वह दूर बैठकर तमाशा देख रही है।

मैकियावेली विचारधारा और भारतीय ‘ताने-बाने’ का विखंडन

यहाँ हमें यह समझना होगा कि यह स्थिति भारतीय दर्शन की उपज नहीं है। भारतीय चिंतन ‘समन्वय’ और ‘सहअस्तित्व’ का है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य पूरी तरह से यूरोपीय मैकियावेली और मार्क्सवादी ‘वर्ग संघर्ष’ के ढांचे पर खड़ा किया गया है।

विदेशी विचारधाराएं यह मानती हैं कि “समाज में शांति, स्थिरता नहीं बल्कि ‘ठहराव’ है।” उनके अनुसार, समाज को गतिशील रखने के लिए निरंतर वर्ग संघर्ष जरूरी है। भारत में इसी विदेशी मॉडल को लागू किया जा रहा है। सरकार और नीति-निर्माता जानबूझकर ऐसे हालात पैदा कर रहे हैं जहाँ:

  • एक भाई दूसरे भाई को ‘हक मारने वाला’ समझे।
  • एक वर्ग को लगे कि ‘संविधान खतरे में है’ और दूसरे को लगे कि ‘योग्यता (Merit) की हत्या हो रही है।’

यह ‘फूट डालो और राज करो’ का क्लासिक ब्रिटिश मॉडल नहीं है, यह उससे भी आगे का ‘लड़ाओ और विवश करो’ (Make them fight and make them dependent) का मैकियावेलियन मॉडल है।

मैकियावेली की प्रयोगशाला: जलते घर का तमाशा

आज जेएनयू से लेकर बीएचयू तक जो आग लगी है, वह किसी छात्र नेता के भाषण से नहीं, बल्कि यूजीसी के उस ड्राफ्ट से लगी है जिसे जानबूझकर ‘अधूरा’ और ‘विवादास्पद’ छोड़ा गया था।

मैकियावेली ने कहा था कि “एक चतुर शासक वह है जो समस्या पैदा करता है ताकि जनता उससे समाधान की भीख मांगे।” सरकार ने पहले समस्या (नियम) पैदा की, फिर समाधान (कोर्ट का स्टे या भविष्य का संशोधन) का वादा लटका दिया।

दुखद यह है कि इस “सत्ता के खेल” में भारत का सामाजिक ताना-बाना तार-तार हो रहा है। छात्र, जो राष्ट्र का भविष्य हैं, वे अब ‘राष्ट्र-निर्माता’ नहीं बल्कि एक-दूसरे के ‘वर्ग-शत्रु’ बन चुके हैं। और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि दोनों ही पक्ष यह नहीं देख पा रहे कि जिस ‘सिस्टम’ के लिए वे लड़ रहे हैं, वह सिस्टम दरअसल गैलरी में बैठकर इस गृहयुद्ध का आनंद ले रहा है।

यह केवल नियमों की लड़ाई नहीं है, यह उस भरोसे की हत्या है जो एक नागरिक को अपने राज्य पर होना चाहिए।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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