Wednesday, February 11, 2026

हनुमान बेनीवाल की खुली पोल? खुद का घर पत्थर का और अरावली बचाने का कर रहे नाटक!

हनुमान बेनीवाल और पर्यावरण पाखण्ड का सवाल

नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल स्वयं को जनपक्षीय और प्रकृति समर्थक बताने की राजनीति करते हैं, लेकिन उनकी सार्वजनिक छवि और निजी आचरण के बीच गहरा विरोधाभास दिखाई देता है। अरावली संरक्षण के नाम पर भावनात्मक बयान दिए जाते हैं, पर व्यक्तिगत जीवनशैली उसी पर्वतमाला के पत्थरों से बने वैभव को सामान्य मानती है।

प्रकृति और मनुष्य का संतुलन

गुरु नानक देव द्वारा रचित जपजी साहिब का अंतिम सलोक प्रकृति को गुरु पिता और माता के समान मानकर मनुष्य के कर्मों की जिम्मेदारी तय करता है। उसमें स्पष्ट कहा गया है कि धरती, जल और वायु केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का नैतिक आधार हैं, जिनके साथ आचरण निर्णायक है।

पत्थर के मकान और अरावली का दोहरा नुकसान

पोस्ट की तस्वीरों में नागौर सांसद का पत्थरों से बना आवास अरावली पर्वतमाला से जुड़े पाखण्ड का प्रतीक बनता है। यदि ऐसे भवन ईंट या वैकल्पिक सामग्री से बनते तो पहाड़ों पर दबाव कम होता। यही प्रवृत्ति राजस्थान के अनेक विधायक सांसद और संभ्रांत वर्ग में भी दिखती है।

कागज बचाओ पत्थर नहीं यह कैसी सोच

पर्यावरण संरक्षण के नाम पर कागज कम उपयोग करने की सलाह दी जाती है, लेकिन अरावली बचाने के लिए पत्थर के उपयोग पर मौन रहता है। भवन निर्माण और सजावट में कोटा स्टोन सैंडस्टोन और मार्बल का व्यापक इस्तेमाल जारी है, जबकि यही खनन पर्वत श्रृंखला को खोखला कर रहा है।

वनवासियों और साधुओं की उपेक्षा

अरावली क्षेत्र में रहने वाले वनवासी समुदाय और आत्मचिंतन में लगे साधु सबसे कम नुकसान करते हैं, फिर भी कीमत वही चुकाते हैं। शहरों में बैठा वर्ग इस प्राकृतिक स्वर्ग को उपभोग की वस्तु मानकर हर अवसर पर दोहन करता है और फिर भावुक नारों से स्वयं को निर्दोष साबित करता है।

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हनुमान बेनीवाल का अरावली के पत्थरों का महल

सोशल मीडिया और भावुकता का बाज़ार

दस बीस हजार फॉलोअर वाले अकाउंट्स लाइक्स व्यू और रेवेन्यू की चाह में अरावली मुद्दे को सनसनीखेज बना रहे हैं। वे स्वयं को अकेला समझदार और सरकार को मूर्ख बताकर प्रस्तुत करते हैं, जबकि वास्तविक नीति और कानूनी तथ्यों को जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वास्तविकता

नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की परिभाषा को स्पष्ट किया ताकि राज्यों में भ्रम समाप्त हो। स्थानीय स्तर से सौ मीटर या अधिक ऊँचे लैंडफॉर्म को अरावली माना गया और पांच सौ मीटर में दो या अधिक पहाड़ियों पर रेंज लागू की गई।

खनन पर रोक और सख्त नियंत्रण

अदालत और सरकार ने नए खनन लाइसेंस पर पूर्ण रोक लगाई है जब तक टिकाऊ खनन योजना न बने। पहले से वैध खनन कड़े नियमों के तहत सीमित रूप में जारी रहेगा। यह व्यवस्था संरक्षण को कमजोर नहीं बल्कि अधिक संरचित बनाती है।

आंकड़ों से फैलाया गया भ्रम

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार राजस्थान की बारह हजार से अधिक पहाड़ियों में केवल लगभग नौ प्रतिशत ही सौ मीटर से ऊँची हैं। इसे इस तरह पेश किया जा रहा है मानो नब्बे प्रतिशत अरावली खोल दी गई हो, जबकि वास्तविक खनन क्षेत्र कुल का केवल शून्य दशमलव उन्नीस प्रतिशत है।

मिसइनफॉर्मेशन और राजनीतिक ड्रामा

सोशल मीडिया पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट को अयोग्य बताकर भय फैलाया जा रहा है। पर्यावरणविद के भेष में छिपे राजनीतिक कार्यकर्ता इसे आपदा और मृत्यु वारंट कह रहे हैं। तथ्य आधारित चर्चा के स्थान पर भावनात्मक नारे और ट्रेंडिंग हैशटैग चलाए जा रहे हैं।

मोदी शाह अडानी को घसीटने की राजनीति

कई एनिमेटेड और एआई वीडियो मोदी शाह और अडानी को अरावली खनन से जोड़कर झूठे दावे कर रहे हैं। विश्वसनीय स्रोतों में कहीं भी अडानी समूह का अरावली खनन से सीधा संबंध नहीं मिलता, फिर भी पुराने विवादों को जोड़कर भ्रम फैलाया जाता है।

सरकार का आधिकारिक पक्ष

पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने स्पष्ट कहा है कि केवल सीमित क्षेत्र में खनन संभव है और नब्बे प्रतिशत से अधिक अरावली संरक्षित रहेगी। नए लाइसेंस बंद हैं और मिसइनफॉर्मेशन जानबूझकर फैलाई जा रही है ताकि राजनीतिक लाभ उठाया जा सके।

असली दुश्मन अवैध खनन माफिया

अरावली के लिए सबसे बड़ा खतरा अवैध खनन माफिया है, जो सभी दलों के प्रभावशाली लोगों से जुड़ा है। इस पर ध्यान देने के बजाय आसान लक्ष्य के रूप में सरकार और विकास को कोसा जा रहा है, क्योंकि सच्चे अपराधियों पर सवाल उठाने से अपने संबंध उजागर हो सकते हैं।

लक्ज़री जीवन और पर्यावरण उपदेश

पेट्रोल डीजल से चलने वाली एसयूवी में घूमते लोग एयर कंडीशंड कमरों में बैठकर पर्यावरण बचाने का उपदेश देते हैं। बड़े नेताओं के काफिले और तथाकथित एक्टिविस्ट सुरक्षा के नाम पर भारी कारें चलाते हैं, लेकिन आम जनता से त्याग की अपेक्षा रखते हैं।

व्यक्तिगत बदलाव से बचने का बहाना

ग्रेटा थुनबर्ग से लेकर भारतीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं तक व्यक्तिगत जीवनशैली बदलने से बचते हैं। सार्वजनिक परिवहन की दुहाई देकर निजी सुविधा को सही ठहराते हैं और कहते हैं कि उनका कार्बन फुटप्रिंट छोटा है जबकि असली नुकसान उद्योग करते हैं। यही दोहरा मापदंड है।

विकास बनाम पर्यावरण का झूठा संघर्ष

उन्नीस सौ नब्बे से दो हजार बीस के बीच अरावली के पत्थरों से रियल एस्टेट और फार्महाउस बूम हुआ तब ये आवाजें शांत थीं। वही पत्थर तब विकास सामग्री थे और आज अचानक पर्यावरण बन गए। यह चयनित नैतिकता अवसरवादी पाखण्ड को उजागर करती है।

रोज़गार और सामाजिक यथार्थ

राजस्थान में खनन से लगभग तीस लाख लोग प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। खनिक ट्रांसपोर्टर और मजदूर Save Aravalli पोस्ट्स में नहीं दिखते क्योंकि भावुक गुस्सा बिकता है सच्चाई नहीं। ईमानदार आंदोलन में इनके जीवन और पुनर्वास की चर्चा होती।

निष्कर्ष व्यक्तिगत जिम्मेदारी की ज़रूरत

अरावली का भविष्य केवल नारे और ट्रेंड से सुरक्षित नहीं होगा। अवैध खनन पर कार्रवाई पुरानी खदानों की बहाली और जीवनशैली में वास्तविक बदलाव आवश्यक हैं। पत्थर के फर्श पर बैठकर संरक्षण की बातें करना पाखण्ड है, समाधान आत्मसंयम और व्यवहार परिवर्तन से ही आएगा।

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Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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