नेता
राजनीति की प्रकृति निष्ठुर अवश्य है, किन्तु यह निष्ठुरता अकारण नहीं होती। भारतीय लोकतंत्र का इतिहास साक्षी है कि यह तंत्र भावनाओं के आवेग से संचालित होता है, जहाँ जनमानस अपने नेताओं को पलकों पर बिठाता है और उन्हें देवतुल्य स्थान प्रदान करता है। परन्तु, जब वही जनमानस यह अनुभव करता है कि उसका विश्वास चला गया है, या जिस विचारधारा और सांस्कृतिक अधिष्ठान के लिए उसने मतदान किया था, उसका सौदा तुष्टीकरण और सत्ता के अहंकार के बाजार में कर दिया गया है, तो वह उसी नेता को अर्श से फर्श पर पटकने में क्षण भर का विलंब नहीं करता।
यह केवल चुनावी हार नहीं होती, बल्कि यह एक प्रकार का सामाजिक और राजनीतिक बहिष्कार होता है, जहाँ नेता बियाबान में अकेला छूट जाता है। वर्तमान भारतीय राजनीति में एक सुखद और क्रांतिकारी परिवर्तन यह देखने को मिल रहा है कि ‘सूडो-सेक्युलरिज्म’ और वंशवाद के आधार पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने वाले क्षत्रपों का सूर्य अब अस्ताचल की ओर है। यह ‘शत्रुबोध’ का जागरण है, जहाँ जनता अब अपने हित और अहित को भली-भांति पहचानने लगी है।
पिछले कुछ वर्षों का कालखंड भारतीय राजनीति में ‘अहंकार के मानमर्दन’ का कालखंड कहा जा सकता है। जिन नेताओं को यह भ्रम हो गया था कि वे अजेय हैं, या उनका वोट बैंक उनकी जागीर है, उन्हें लोकतंत्र ने अपनी शक्ति का परिचय कराया है। सत्ता का मद जब व्यक्ति के विवेक को हर लेता है, तो पतन की पटकथा उसी क्षण लिख दी जाती है। यह लेख उन प्रमुख राजनीतिक रथी-महारथियों के उत्थान और पतन का विश्लेषण है, जिन्होंने जनादेश का अपमान किया और परिणामस्वरुप आज वे अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को विवश हैं।
महाराष्ट्र का महानाटक: मराठा क्षत्रपों का पराभव
शरद पवार: मिथकों का अंत और चाणक्य नीति की विजय
महाराष्ट्र की राजनीति में दशकों तक शरद पवार का नाम एक ऐसे नेता के रूप में लिया जाता रहा, जिसे कभी मात नहीं दी जा सकती। उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार और देश का सबसे चतुर राजनेता माना जाता था। किन्तु, सत्य यह है कि शरद पवार का राजनीतिक आभामंडल वास्तविकता से अधिक भ्रम पर आधारित था। यह भ्रम तब तक बना रहा, जब तक उनके सामने कोई सशक्त वैचारिक चुनौती नहीं थी। भारतीय राजनीति में अमित शाह के उदय ने इस भ्रम को तोड़कर रख दिया। शरद पवार ने 2019 में जनादेश के विपरीत जाकर महाविकास अघाड़ी का जो अप्राकृतिक गठबंधन बनाया, वह उनकी राजनीतिक समझ की सबसे बड़ी भूल सिद्ध हुई। उन्हें लगा था कि वे भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखकर अपनी बादशाहत कायम रखेंगे, किन्तु वे यह भूल गए कि ‘न्यू इंडिया’ की राजनीति अब पुरानी जोड़-तोड़ से नहीं चलती।

शरद पवार दस वर्षों तक देश के कृषि मंत्री रहे, फिर भी महाराष्ट्र और विशेषकर विदर्भ के किसानों की आत्महत्याएं नहीं रुकीं। उनके मंत्रित्व काल में कृषि व्यवस्था रसातल में गई, किन्तु उनका राजनीतिक रसूख बना रहा। यह रसूख उनकी प्रशासनिक क्षमता के कारण नहीं, बल्कि उनके जोड़-तोड़ के कौशल के कारण था। आज स्थिति यह है कि जिस भतीजे (अजित पवार) को उन्होंने तैयार किया, वही उनसे अलग हो गया। पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ जैसे उनके गढ़ में भी आज उन्हें अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह अमित शाह की कूटनीति का ही परिणाम है कि जिस शरद पवार के इशारे पर कभी दिल्ली की सरकारें हिल जाती थीं, आज वे अपने ही घर में दो-चार नगर निगम सीटों के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। यह पतन उस अहंकार का परिणाम है, जिसने जनादेश को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ लिया था।
उद्धव ठाकरे: विरासत का अपमान और हिंदुत्व से विश्वासघात
बालासाहेब ठाकरे की विरासत केवल एक राजनीतिक पार्टी की विरासत नहीं थी, वह एक ज्वलंत विचार की विरासत थी, जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और प्रखर हिंदुत्व पर आधारित थी। नेता उद्धव ठाकरे ने सत्ता के लोभ में उस विरासत का ही सौदा कर दिया। कांग्रेस और एनसीपी के साथ उनका गठबंधन केवल राजनीतिक अवसरवाद नहीं था, बल्कि यह उस ‘सूडो-सेक्युलरिज्म’ के आगे घुटने टेकना था, जिसके खिलाफ बालासाहेब जीवन भर लड़े। उद्धव ठाकरे को यह मुगालता हो गया था कि भाजपा का साथ छोड़कर वे महाराष्ट्र के एकछत्र सम्राट बन जाएंगे। उन्होंने हिंदुत्व की जिस विचारधारा की तिलांजलि दी, उसी ने उनकी राजनीतिक जमीन खिसका दी। जनादेश भाजपा-शिवसेना गठबंधन को मिला था, लेकिन मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा में उद्धव ने जनमत का अपमान किया।

आज उद्धव ठाकरे की स्थिति ‘न घर के, न घाट के’ वाली हो गई है। जिस कांग्रेस के साथ जाने के लिए उन्होंने अपनी विचारधारा छोड़ी, आज वही कांग्रेस बीएमसी चुनाव में उनसे किनारा कर रही है ताकि मुस्लिम वोट बैंक नाराज न हो जाए। यह तुष्टीकरण की राजनीति का वीभत्स चेहरा है। एकनाथ शिंदे का उदय कोई सामान्य घटना नहीं है; यह शिवसैनिकों के भीतर पनपे उस आक्रोश का परिणाम है, जो देख रहे थे कि उनका नेतृत्व ‘जनाब बालासाहेब’ की राह पर चलने लगा है। आज मातोश्री का वह ओज समाप्त हो चुका है। जहाँ कभी दिल्ली के बड़े-बड़े नेता नतमस्तक होते थे, आज वहां सन्नाटा पसर रहा है। उद्धव ठाकरे ने अपने अहंकार में यह नहीं समझा कि शिवसैनिक ‘गद्दारी’ को कभी क्षमा नहीं करते, और असली गद्दारी विचारधारा से की गई थी, न कि किसी व्यक्ति से।
उत्तर भारत और वंशवाद का सूर्यास्त
लालू प्रसाद यादव: जंगलराज की स्मृतियाँ और परिवारवाद का बोझ
बिहार की राजनीति में नेता लालू प्रसाद यादव का पतन इस बात का प्रमाण है कि जनता अब कोरे ‘सामाजिक न्याय’ के नारों से नहीं, बल्कि विकास और कानून के राज से प्रभावित होती है। एक समय था जब लालू यादव की उंगली के इशारे पर बिहार की राजनीति घूमती थी। ‘चारा घोटाला’ और ‘जंगलराज’ के कलंक के बावजूद वे अपनी जातिगत समीकरणों के बल पर टिके रहे। परन्तु, उन्होंने अपनी विरासत को केवल अपने परिवार तक सीमित कर दिया। तेजस्वी यादव को थोपने की उनकी जिद ने पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया। बिहार की जनता, विशेषकर युवा वर्ग, अब उस दौर में वापस नहीं जाना चाहता जहाँ अपहरण एक उद्योग था।

लालू यादव का अहंकार यह था कि वे जेल में रहकर भी बिहार की सत्ता संचालित कर सकते हैं। लेकिन हालिया चुनावों और राज्यसभा की सीटों के परिणामों ने सिद्ध कर दिया है कि बिहार ने अब वंशवाद को नकार दिया है। “हम तो डूबे हैं सनम, तुम्हें भी ले डूबेंगे” की तर्ज पर लालू यादव ने न केवल अपना राजनीतिक भविष्य अंधकारमय किया, बल्कि तेजस्वी यादव की संभावनाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यह उस राजनीति का अंत है जो विकास के स्थान पर जातिगत विद्वेष और तुष्टीकरण पर पलती थी।
सुखबीर बादल: पंथक राजनीति का बाजारीकरण
पंजाब में नेता प्रकाश सिंह बादल का कद बहुत बड़ा था, वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि सिख पंथ की एक आवाज माने जाते थे। परन्तु, पुत्र मोह में धृतराष्ट्र बन जाना भारतीय राजनीति का पुराना अभिशाप है। सुखबीर बादल को कमान सौंपना अकाली दल के लिए आत्मघाती सिद्ध हुआ। सुखबीर बादल ने पार्टी को एक कॉर्पोरेट कंपनी की तरह चलाया, जिससे अकाली दल का मूल ‘पंथक’ चरित्र नष्ट हो गया।

जनता और विशेषकर सिख समुदाय के मन में यह धारणा घर कर गई कि बादल परिवार के लिए पंथ और पंजाब से ऊपर उनका अपना व्यापारिक हित है। इसका परिणाम यह हुआ कि जिस अकाली दल का पंजाब के जर्रे-जर्रे पर प्रभाव था, आज वह अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। यह अर्श से फर्श तक की सबसे तेज गिरावटों में से एक है, जो यह सिखाती है कि विरासत को संभाला जाता है, उसे भुनाया नहीं जाता।
मायावती: सोशल इंजीनियरिंग से राजनीतिक शून्यता तक
मायावती का पतन उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक केस स्टडी है। 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली नेता मायावती, जिन्हें कभी प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार माना जाता था, आज मात्र एक विधायक वाली पार्टी की नेता बनकर रह गई हैं। इसका मुख्य कारण उनका अपने मूल मतदाता से कटना और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की लहर को न समझ पाना है।

जब देश और प्रदेश ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र के साथ आगे बढ़ रहा था, तब मायावती पुरानी जातिगत गणित और टिकट वितरण के अर्थशास्त्र में उलझी रहीं। मतदाता अब जागरूक हो चुका है; वह समझता है कि केवल मूर्तियों के निर्माण से उसका भला नहीं होगा। मायावती का अहंकार उन्हें जनता से दूर ले गया और आज वे राजनीतिक परिदृश्य में अप्रासंगिक होती जा रही हैं।
दक्षिण भारत और महत्वाकांक्षा का मृगतृष्णा
के. चंद्रशेखर राव (KCR): राष्ट्रीय स्वप्न और क्षेत्रीय हकीकत
तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (KCR) का उदाहरण यह दर्शाता है कि जब क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी सीमाओं को लांघकर बिना किसी ठोस आधार के राष्ट्रीय नेता बनने का स्वप्न देखने लगते हैं, तो उनका पतन निश्चित होता है। दो बार मुख्यमंत्री बनने के बाद नेता KCR को यह भ्रांति हो गई थी कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प बन सकते हैं।

उन्होंने अपनी पार्टी का नाम बदलकर ‘भारत राष्ट्र समिति’ कर दिया, जो उनके अहंकार का चरम था। प्रधानमंत्री का अपमान करना, संवैधानिक संस्थाओं की अवहेलना करना और अपने लिए ‘शीश महल’ जैसा निवास बनवाना – यह सब जनता देख रही थी। लोकतंत्र में जनता शासक को सेवक के रूप में देखना चाहती है, न कि नए निजाम के रूप में। आज उनकी पार्टी तेलंगाना में ही संघर्ष कर रही है और राष्ट्रीय फलक पर उनका कोई नामलेवा नहीं है।
जगन मोहन रेड्डी: प्रतिशोध की ज्वाला में भस्म
आंध्र प्रदेश में नेता जगन मोहन रेड्डी का उदय जितना नाटकीय था, उनका पतन उतना ही शिक्षाप्रद है। प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद, जगन ने शासन को जनसेवा का माध्यम बनाने के बजाय प्रतिशोध का हथियार बना लिया। चंद्रबाबू नायडू को जेल भेजने की उनकी कार्रवाई ने न केवल लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार किया, बल्कि जनता की सहानुभूति को भी नायडू के पक्ष में मोड़ दिया।

जगन मोहन रेड्डी का यह मानना कि मुफ्त की रेवड़ियां (Freebies) बांटकर और विरोधियों को कुचलकर वे सदा के लिए सत्ता में बने रहेंगे, उनकी सबसे बड़ी भूल थी। जनता ने उन्हें बता दिया कि लोकतंत्र में प्रतिशोध नहीं, परफॉरमेंस चलता है। 2019 से 2024 के बीच का उनका सफर अर्श से फर्श तक की कहानी कहता है।
सचिन पायलट: अधूरी बगावत का दर्द
राजस्थान के नेता सचिन पायलट का प्रसंग थोड़ा भिन्न है, किन्तु निष्कर्ष वही है। मेहनत करके पार्टी को सत्ता में लाने के बाद, जब उन्हें मुख्यमंत्री पद नहीं मिला, तो उनकी महत्वाकांक्षा ने धैर्य का साथ छोड़ दिया। उनकी बगावत न तो पूरी तरह सफल हुई और न ही वे पूरी तरह निष्ठावान रह पाए। ‘न खुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम’ वाली स्थिति ने उनकी विश्वसनीयता को संदिग्ध बना दिया।

अशोक गहलोत जैसे मझे हुए जादूगर के सामने उनकी अपरिपक्वता उजागर हो गई। आज वे न प्रदेश की सत्ता के केंद्र में हैं और न ही विपक्ष की धुरी बन पाए हैं। यह सिद्ध करता है कि राजनीति में केवल युवा जोश नहीं, बल्कि धैर्य और सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता (Timing) भी आवश्यक है।
जनमत का शंखनाद
उपर्युक्त सभी उदाहरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारतीय लोकतंत्र अब परिपक्व हो चुका है। अब मतदाता ‘बाप-दादा’ के नाम पर, या जाति के नाम पर, या झूठे धर्मनिरपेक्षता के डर से वोट नहीं देता। यह ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का युग है, जहाँ राष्ट्रहित और विकास सर्वोपरि है। जिन नेताओं ने यह समझा कि जनता नासमझ है, जनता ने उन्हें उनकी सही जगह दिखा दी।
यह पतन उन सभी के लिए एक चेतावनी है जो सत्ता को ‘सेवा’ के बजाय ‘स्वयं-सेवा’ का माध्यम मानते हैं। राजनीति में अहंकार का कोई स्थान नहीं है, और जो यह नहीं समझता, उसे समय और जनता, दोनों ही इतिहास के कूड़ेदान में फेंकने में तनिक भी संकोच नहीं करते। अर्श से फर्श की यह दूरी उतनी ही है, जितनी एक नेता के आचरण और जनता की अपेक्षाओं के बीच की दूरी होती है।
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