धुरंधर: ‘द रिवेंज’
‘धुरंधर: द रिवेंज’ का खौफ: पर्दे पर उतरा आतंकवाद का नंगा सच, तो बौखला उठा वामपंथी इकोसिस्टम
विकिपीडिया पर आदित्य धर की फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ को ‘प्रोपेगेंडा’ घोषित करने की जो बेशर्म हड़बड़ी दिखाई गई है, वह उस वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम की सामूहिक बौखलाहट है जिसकी जमीन अब खिसक चुकी है।

द वायर जैसे पोर्टल्स का रुदन और उनकी छटपटाहट यह चीख-चीख कर बता रही है कि इस फिल्म ने उनके दशकों पुराने नैरेटिव के ताबूत में आखिरी और सबसे मजबूत कील ठोक दी है।
जब सिनेमाई पर्दे पर पाकिस्तान के पाले हुए आतंकवाद का नंगा सच बिना किसी सेक्युलर चाशनी के प्रस्तुत किया जाता है, तो इन वामपंथी दरबारियों के पेट में मरोड़ उठना स्वाभाविक है।
इनका असल खौफ किसी फिल्म की बॉक्स ऑफिस सफलता से नहीं है, बल्कि उस क्रूर सच्चाई से है जो अब सीधे भारतीय दर्शकों की नसों में उतर रही है और लुटियंस दिल्ली में बैठकर बुने गए झूठ के उस जाल को तार-तार कर रही है जिसे इन्होंने ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का नाम दे रखा था।
‘पठान’ का बेशर्म महिमामंडन और ‘धुरंधर’ से वैचारिक चिढ़
इन स्वघोषित फिल्म समीक्षकों और वामपंथी गिरोह का पाखंड और दोहरा मापदंड अब पूरी तरह से नंगा हो चुका है। जरा इनकी निर्लज्जता का स्तर देखिए!
जब ‘पठान’ जैसी फिल्म आती है, जिसमें एक भारतीय जासूस एक पाकिस्तानी आईएसआई एजेंट के साथ बिकिनी में रोमांस करता है और देश की सुरक्षा व भू-राजनीति को एक फूहड़ संगीत वीडियो के स्तर पर गिरा दिया जाता है, तो यही द वायर और उसके दरबारी इसे “सांस्कृतिक उत्कृष्ट कृति” और “सार्वभौमिक भाईचारे” का महान प्रतीक घोषित कर देते हैं। उन्हें उसमें कोई प्रोपेगेंडा नजर नहीं आता।

लेकिन जब ‘धुरंधर’ जैसी फिल्म पाकिस्तान के अंडरवर्ल्ड, कराची के ल्यारी गैंग, आईएसआई के खूनी आतंकी नेटवर्क और 26/11 के असली और दर्दनाक ट्रांसक्रिप्ट्स को दुनिया के सामने पूरी नग्नता के साथ रखती है, तो अचानक इनके पसीने छूटने लगते हैं।
सच्चाई यह है कि इस वामपंथी इकोसिस्टम को सिनेमा में पाकिस्तान हमेशा एक ‘गलत समझे गए’, ‘मासूम’ और ‘पीड़ित’ पड़ोसी के रूप में चाहिए। एक ऐसा आतंकी राष्ट्र जो भारत को हजार घाव देने की घोषित नीति पर काम करता है, उसकी असलियत को उजागर करना इनकी नजर में “खतरनाक राष्ट्रवाद”, “अंधराष्ट्रवाद” और “प्रोपेगेंडा” बन जाता है।
2008 के रक्तरंजित घाव और ‘माय नेम इज खान’ का विकृत एजेंडा
वर्ष 2008 भारतीय इतिहास के उन काले अध्यायों में से एक है जिसे कोई भी सच्चा भारतीय नहीं भूल सकता। मई 2008 में जयपुर के सड़कें निर्दोषों के खून से लाल हो गईं जब सिलसिलेवार धमाकों ने 60 से अधिक जानें लीं।
उसके बाद जुलाई में बैंगलोर और अहमदाबाद के विस्फोट, सितंबर में दिल्ली के धमाके, अक्टूबर में असम और फिर नवंबर में मुंबई पर हुए उस भीषण 26/11 आतंकी हमले ने पूरे देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया था।

इन सभी रक्तपातों के तार सीधे तौर पर सीमा पार बैठे मजहबी जिहादियों और पाकिस्तानी आकाओं से जुड़े थे। लेकिन बॉलीवुड और इस वामपंथी गिरोह का एजेंडा देखिए! इतने भीषण हमलों और सैकड़ों चिताओं की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि ठीक एक साल बाद ‘माय नेम इज खान’ जैसी फिल्में छाती पीटते हुए रिलीज कर दी जाती हैं।
इस फिल्म का एकमात्र उद्देश्य इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ दुनिया भर में उठ रहे जायज आक्रोश को ‘इस्लामोफोबिया’ का फर्जी रंग देकर आतंकियों के प्रति सहानुभूति बटोरना था। जब जिहादियों के लिए यह वैचारिक ढाल बनाई जाती है, तो उसे ‘सिनेमाई स्वतंत्रता’ का नाम दिया जाता है।
लेकिन आज जब ‘धुरंधर’ उन 2008 के घावों की असली वजहों, उस जिहादी मानसिकता और आतंकवाद की उस खौफनाक फैक्ट्री को बेनकाब कर रही है, तो यही लिबरल गिरोह विलाप करने लगा है कि यह समाज के लिए खतरनाक है।
‘एनिमल’ की अकारण हिंसा पर तालियां, लेकिन राष्ट्रवाद पर विलाप
आज जो वातानुकूलित कमरों में बैठे बुद्धिजीवी ‘धुरंधर’ में दिखाई गई वास्तविकता और राष्ट्रवाद को समाज और युवाओं के मस्तिष्क के लिए ‘नकारात्मक’ बता रहे हैं, उनका पाखंड तब पूरी तरह से उघड़ जाता है जब वे ‘एनिमल’ जैसी फिल्म की वीभत्स, उद्देश्यहीन और बर्बर हिंसा पर सिनेमाघरों में खड़े होकर तालियां पीटते हैं। जब एक नायक बिना किसी राष्ट्रीय उद्देश्य के केवल अपने अहंकार के लिए मशीनगन से सैकड़ों को भून देता है, तो इन्हें उस अकारण हिंसा में महान सिनेमाई ‘कला’ और ‘स्वतंत्रता’ नजर आती है। लेकिन जब देश की रक्षा के लिए, आतंकियों के सफाए के लिए सेना और खुफिया एजेंसियों के शौर्य को पर्दे पर उतारा जाता है, तो इनके कोमल और सेक्युलर हृदयों को गहरा आघात लग जाता है। राष्ट्रभक्ति के दृश्यों को देखकर इनकी रूह कांपने लगती है और ये इसे युवाओं को भड़काने वाला कृत्य बताने लगते हैं।
हिंदू देवी-देवताओं का अपमान: पीके से लेकर बजरंगी भाईजान तक का हिंदूफोबिया
दशकों से बॉलीवुड एक सुनियोजित और जहरीले नैरेटिव का अड्डा रहा है। ‘पीके’, ‘कुछ कुछ होता है’, और ‘बजरंगी भाईजान’ जैसी फिल्मों के जरिए जानबूझकर हिंदू देवी-देवताओं का उपहास करना, भारतीय सनातन संस्कृति को अंधविश्वासी और पाखंडी बताना और इसके ठीक विपरीत पाकिस्तानी किरदारों को अति-मानवीय, सहृदय और शांति का मसीहा दिखाना बॉलीवुड का एक अघोषित और पवित्र नियम रहा है।
सिनेमा के पर्दे पर हिंदू को हमेशा जाहिल, ढोंगी, अत्याचारी या खलनायक के रूप में ही गढ़ा गया, जबकि सीमा पार से आने वाले व्यक्ति को हमेशा प्रेम और इंसानियत की चाशनी में डुबोकर पेश किया गया।
‘धुरंधर’ ने इसी स्थापित हिंदूफोबिक और पाकिस्तान-प्रेमी बॉलीवुडिया ढांचे की ईंट से ईंट बजा दी है। धुरंधर फिल्म ने बिना किसी झिझक के दिखाया है कि असली राक्षस कौन है और पीड़ित कौन है। इसी सच ने वामपंथियों की नींद उड़ा दी है और उनकी चीखें अब सात समंदर पार तक सुनाई दे रही हैं।
आतंकियों का मानवीकरण और शहादतों का जघन्य अपमान
बॉलीवुड ने एक लंबे और सोचे-समझे षड्यंत्र के तहत आतंकवाद का रोमांटिकरण किया है। ‘मिशन कश्मीर’, ‘फना’, ‘रोजा’ और ‘दिल से’ जैसी दर्जनों फिल्मों को उठाकर देख लीजिए, वहां आतंकी को हमेशा एक ‘भटके हुए मासूम युवा’ के रूप में पेश किया गया।
दर्शकों के दिमाग में लगातार यह जहर भरा गया कि उसके हाथ में जो एके-47 है, वह किसी ‘मजबूरी’, बेरोजगारी या सिस्टम के ‘अत्याचार’ का परिणाम है। हर बम फोड़ने वाले खूंखार हत्यारे के पीछे एक दर्दनाक प्रेम कहानी या उसका शोषित बचपन दिखाकर उसके गुनाहों पर पर्दा डाला गया।
इन फिल्मों ने योजनाबद्ध तरीके से आतंकवाद की उस वास्तविक जिहादी विचारधारा को पर्दे के पीछे छिपा दिया जो मदरसों और आतंकी कैंपों में बोई जाती है।
इसके ठीक उलट, ‘धुरंधर’ किसी आतंकी को महान या बेचारा नहीं बनाती। धुरंधर फिल्म उस दरिंदगी को सामने रखती है जिसे आज तक छिपाया गया था। धुरंधर फिल्म याद दिलाती है 1999 के कारगिल युद्ध से पहले पाकिस्तानी सेना द्वारा कैप्टन सौरभ कालिया को दी गई उन अमानवीय और बर्बर यातनाओं की, जिनका जिक्र करने से भी इन सेक्युलर फिल्मकारों के होंठ सिल जाते थे।
जब राष्ट्रभक्त सैनिकों का यह असीम दर्द और पाकिस्तान की यह राक्षसी दरिंदगी बड़े पर्दे पर बिना किसी फिल्टर के दिखाई जाती है, तो द वायर जैसे पोर्टल्स और उनके दरबारी समीक्षकों को इसमें ‘टॉक्सिक नेशनलिज्म’ का भ्रम होने लगता है।
‘द कश्मीर फाइल्स’ से शुरू हुई क्रांति और टूटता हुआ वामपंथी तिलिस्म
यह कोई सामान्य वैचारिक टकराव नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक महायुद्ध है जिसकी ठोस नींव ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने रखी थी। उस फिल्म ने जिस सच्चाई का दरवाजा खोला, उसे ‘द केरला स्टोरी’, ‘बारामूला’ और अब ‘धुरंधर: द रिवेंज’ पूरी ताकत से आगे बढ़ा रही हैं।
इन साहसिक फिल्मों ने दशकों से चले आ रहे उस वामपंथी तिलिस्म और नैरेटिव को जड़ से उखाड़ फेंका है जिसमें दिन-रात यह रटाया जाता था कि भारत की हर समस्या का एकमात्र कारण हिंदू बहुसंख्यक समाज है।
आज भारत का दर्शक अपनी गहरी नींद से जाग चुका है। वह भली-भांति समझ चुका है कि बॉलीवुड अब तक एक ऐसी झूठी और भ्रमित दुनिया रचता रहा है जहां आतंकवादी का दिल सोने का होता है और देश को तोड़ने वाले देशद्रोहियों को महान क्रांतिकारी का दर्जा दिया जाता है।
आज का आम भारतीय अपने राष्ट्र की सुरक्षा, अपनी सेना के अदम्य शौर्य और देश के दुश्मनों की नंगी वास्तविकता को लेकर किसी भी प्रकार के लिबरल अपराधबोध (गिल्ट) का शिकार नहीं है। वह अब पाकिस्तानी जासूसों को गले लगाने वाली झूठी और आत्मघाती कहानियों को कूड़ेदान में फेंक कर कड़वे भू-राजनीतिक सत्य को पूरे गर्व के साथ स्वीकार कर रहा है।
सत्य का सिनेमा और भारत का नया सांस्कृतिक सूर्योदय
वामपंथी आलोचकों और दरबारी पत्रकारों का यह वर्तमान प्रलाप और उनका उबलता हुआ आक्रोश सिनेमाई कला को बचाने के लिए नहीं है, बल्कि अपनी उस खोती हुई सत्ता और एकाधिकार के छिन जाने के डर से है जो उन्होंने दशकों से कायम कर रखा था।
उन्हें इस बात का खौफ अंदर ही अंदर खाए जा रहा है कि फिल्म निर्माण और जनता के मन-मस्तिष्क तक कहानी पहुंचाने की जो ताकत कभी केवल उनके हाथों में थी, वह अब छिन चुकी है। अब लुटियंस जोन में बैठे ये मुट्ठी भर लोग यह तय नहीं कर सकते कि भारत का आम नागरिक पर्दे पर क्या देखेगा और क्या सोचेगा।
‘धुरंधर: द रिवेंज’ महज एक एक्शन फिल्म नहीं है; यह एक प्रचंड सांस्कृतिक सुधार है। यह इस बात की दहाड़ है कि भारत अब झूठ, लीपापोती और झूठे सेक्युलरिज्म के बोझ तले दबकर नहीं जिएगा।
अगर सिनेमा के जरिए राष्ट्रवाद की ज्वाला को भड़काना और देश के गद्दारों और दुश्मनों को उनकी असली औकात दिखाना ‘प्रोपेगेंडा’ है, तो आज का नया भारत इस प्रोपेगेंडा का सीना ठोककर स्वागत करता है।
यह लिबरल गिरोह चाहे जितने भी पन्ने काले कर ले, विकिपीडिया पर बैठकर चाहे जितने षड्यंत्र रच ले या बौद्धिक फतवे जारी कर ले, धुरंधर से सत्य और राष्ट्रवाद की यह जो सुनामी उठी है, वह अब किसी के रोके रुकने वाली नहीं है।
‘धुरंधर 2’ का दमदार आगाज़, लेकिन क्या बरकरार रह पाया पहला वाला जादू?

