Sunday, April 5, 2026

सिलेबस में मजहबी क्रूरता को छिपाने का कांग्रेसी इतिहास, यह था मजहब का सच जिसे छिपाया!

सिलेबस

इन्दिरा गांधी सरकार के समय राष्ट्रीय एकता परिषद और AMU के प्रोफेसर तथा इन्दिरा सरकार में तैनात शिक्षा मंत्री सैय्यद नुरुल हसन द्वारा NCERT व देश की शिक्षा नीति में इतिहास विषय के पाठ्यक्रम में एक दिशा निर्देश यह जारी हुआ था :―

“मध्यकाल को काला युग(डार्क एज) या हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच संघर्ष के काल के रूप में दिखाना मना है। इतिहासकार मुसलमानों को शासक और हिन्दुओं को शासित के रूप में नहीं दिखा सकते। बिना धर्म(रिलीजन) के वास्तविक प्रभाव की जांच किए राज्य को धर्मसत्तात्मक (थियोक्रेसी) नहीं बताया जा सकता। राजनीतिक संघर्ष में धर्म की भूमिका को बढ़ा चढ़ा कर दिखाने की इजाजत नहीं दी जा सकती…न ही मेल जोल की प्रक्रियाओं और प्रवृत्तियों की अपेक्षा होनी चाहिए।”

दिशा निर्देश सेक्युलर लिबरल वामपंथी इतिहासकारों के गैंग सरगना मालिक तथा तत्समय के शिक्षा मंत्री सैय्यद नुरुल हसन द्वारा सरकार की पूर्ण इजाजत लेकर जारी करवाया गया था।

अब याद कीजिए कक्षा 11 की इतिहास विषय की NCERT पाठ्य पुस्तक जिसे वामपंथी धड़े के ही एक चर्चित प्रोफेसर सतीश चन्द्र ने लिखा था और 1986 से लेकर अब तक यही NCERT छात्रों को सिलेबस में पढ़ने पढ़ाये जाने में इस्तेमाल होती आई है।

इस पाठ्य पुस्तक में 378 पृष्ठों के भीतर मध्यकालीन भारतीय इतिहास की सामग्री संकलित की गई है तथा सल्तनत युग और मुगल काल खंड में विभक्त इस ऐतिहासिक सामग्री में ऊपर वर्णित दिशा निर्देशों का अक्षरशः पालन किया गया है।

वामपंथियों के इस गढ़े गए या फ्रॉड तरीके से स्थापित नैरेटिव्स के विपरीत मध्यकाल में इस्लामी शासन काल के दौरान तुर्कों और मुगलों के राजदरबार में मौजूद दरबारी इतिहासकारों ने इस्लामी शासकों के क्रियाकलाप का जो चित्र खींचा है, उसे हमारे छात्रों और अध्येताओं को अनिवार्य रूप से जानना चाहिए।

अमीर खुसरो, हसन निजामी, जियाउद्दीन बरनी, शम्स ए सिराज अफीफ फख्र ए मुदब्बिर, अब्दुल कादिर बदायूंनी, सरहिंदी, साकी मुस्तैद खान,अबुल फजल, फरिश्ता आदि ने मुसलमानी शासन के बारे में जो लिखा है, अध्येताओं को उसे सबसे पहले जानना चाहिए।

इन इतिहासकारों की नजर में इस्लाम की उपलब्धियां थी –

1) लगातार जिहाद में लाखों लाख घृणित काफिरों को दोजख भेज दिया गया।
2) मूर्तिपूजा के हजारों स्थलों और तीर्थों को नष्ट और अपवित्र किया गया।
3) हजारों ब्राह्मणों और भिक्षुओं को मार डाला गया और बाकियों को जबरन गो मांस खिलाया गया।
4) भारी मात्रा में बहुमूल्य चीजें लूटी गई और उसे प्रोफेट द्वारा तय किए गए नियम के अनुसार मोमिनों(मुसलमानों) में बांटा गया।
5) लाखों लाख पुरुषों और स्त्रियों व बच्चों को पकड़ कर दूर दराज इस्लामी देशों में गुलाम और रखैलों के रूप में बेचा गया।
6) बड़ी आबादी पर सत्ता और सुविधा हथियाई गई, जिसे दासता में रखा गया।
7) तलवार के बल पर इस्लामी मजहबी किताबों का वर्चस्व बनाया गया।

इन बातों को ये धूर्त इतिहासकार कभी भी नहीं पढ़ाते, बताते। इसीलिए छात्र या अध्येता इस्लाम और इस्लामी साम्राज्यवाद के वास्तविक चरित्र से परिचित हो ही नहीं पाते।

ऐसे में उनमें रियल शत्रु बोध और इतिहास बोध पनप कैसे सकेगा ?

(― कुमार शिव, भारत में इस्लामी साम्राज्यवाद की कहानी, सीताराम गोयल की पुस्तक से सन्दर्भ सामग्री ली गई है।)
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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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