Friday, February 13, 2026

California: पूरा कैलिफोर्निया दंगों की आग में झुलसा, अमेरिकी केन्द्र और राज्य में ठनी

California: क्या कोई ऐसा लोकतंत्र है जहाँ संविधान से अधिक महत्व ‘राज्य की जिद’ को दिया जाए? क्या कोई ऐसा प्रगतिशील समाज है जो अवैधता को अपनी राजनीतिक अस्मिता का आधार बना ले?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘हां’ में है, तो उसका सबसे सटीक उदाहरण आज का कैलिफोर्निया है, जहाँ एक ओर संघीय सरकार अवैध प्रवासियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई कर रही है, वहीं दूसरी ओर एक राज्य प्रशासन अपने को संप्रभु राष्ट्र समझते हुए उसका विरोध कर रहा है।

California: संघीय बनाम राज्यीय सत्ता का टकराव

लॉस एंजल्स में हालात इस कदर बिगड़े हैं कि 2000 नेशनल गार्ड तैनात करने पड़े, जिसमें से 300 केवल फेडरल बिल्डिंग की सुरक्षा में लगाए गए हैं। ‘मरीन’ को भी तैनात करने की बात हो रही है। यह सब इसलिए कि केंद्र सरकार ने अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई तेज़ की है।

परंतु आश्चर्यजनक यह है कि कैलिफोर्निया का गवर्नर इसे अपनी सत्ता पर आक्रमण मानता है, और ट्रम्प प्रशासन पर मुक़दमे की धमकी दे रहा है, यह कहते हुए कि बिना राज्य सरकार की अनुमति संघीय एजेंसियाँ अवैध प्रवासियों को नहीं पकड़ सकतीं।

संविधान की मूलभूत भावना स्पष्ट है, राष्ट्रीय सुरक्षा, आप्रवासन, सीमाओं की निगरानी और विदेशी नागरिकों के मुद्दे संघीय विषय हैं, राज्यों के नहीं। पर कैलिफोर्निया की राजनीति अब पहचान-आधारित वामपंथी वैचारिक प्रयोगशाला से चल रही है, जहाँ अवैधता ‘मानवाधिकार’ बन चुकी है।

हिंसा और प्रदर्शन: जब कानून की जगह उग्रता ले ले

स्थिति भयावह है, नकाबपोश प्रदर्शनकारी सड़कों पर हिंसा कर रहे हैं, कारों में आग लगा रहे हैं, संपत्तियों को नुकसान पहुँचा रहे हैं, और यह सब “अधिकारों” के नाम पर हो रहा है।

जो प्रवासी न तो देश की नागरिकता रखते हैं, न ही कानूनी दस्तावेज, वे अब “ह्यूमन राइट्स” के झंडाबरदार बन बैठे हैं। प्रदर्शन में खुलेआम मेक्सिकन झंडे लहराए जा रहे हैं।

यह कैसी विडंबना है कि जिस देश में अवैध घुसे हैं, उसी के कानूनों को चुनौती देने के लिए वे अपने मूल देश के प्रतीक लेकर खड़े हैं — और तथाकथित उदारवाद इसे “संवेदनशीलता” मानता है।

पुलिस प्रमुख ने मानी हार, पुलिस की गाड़ियों में आगजनी तोड़फोड़

लॉस एंजेल्स के पुलिस प्रमुख ने स्वयं स्वीकार किया है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर है, और अब केंद्रीय मदद अनिवार्य है। परंतु राजनीति ने इसपर भी असहमति की चादर ओढ़ ली है।

ट्रम्प ने स्पष्ट कहा, “ठगों को छोड़ना मत, अपना कर्तव्य निभाओ।” पर राज्य प्रशासन अब भी संवैधानिक जिम्मेदारियों से ज्यादा, ‘राजनीतिक शुद्धता’ की छाया में है।

विदेशी पत्रकारों पर हमला, यही है अमेरिका की प्रेस फ्रीडम ?

इस सबके बीच दो विदेशी पत्रकार — एक ऑस्ट्रेलियन महिला और एक ब्रिटिश पत्रकार, घायल हुए। रबर बुलेट, भीड़ की हिंसा, और अस्पताल की खामोशी, क्या इन विदेशी पत्रकारों को भी अब ‘नस्लभेदी ताक़तों’ का शिकार कहेंगे?

स्वास्थ्य सेवा और कानून: क्या अवैधता का पुरस्कार है नागरिक सुविधा?

प्रस्तावित है कि अवैध प्रवासियों को मुफ्त हेल्थकेयर न दी जाए। यह प्रस्ताव अमेरिका के सामाजिक विमर्श में भूचाल ला देगा। सवाल उठेगा, करदाता की जेब का पैसा किसके लिए? एक ओर नागरिकों को महँगी स्वास्थ्य सेवाएं, दूसरी ओर अवैध प्रवासियों को मुफ्त लाभ? क्या यह कानून की हत्या नहीं?

कैलिफोर्निया का विघटनकारी मॉडल, और बाकी राज्यों के लिए चेतावनी

कैलिफोर्निया आज ‘वामपंथी राज्यवाद’ का नमूना बन चुका है। जिस तरह अफगानिस्तान में तालिबान ने एक तानाशाही को “धार्मिक आदेश” कहा, उसी तरह कुछ अमेरिकी राज्यों में कानून विरोध को “संवेदनशीलता” कहा जा रहा है।

पर यह संवेदनशीलता नहीं, एक सुनियोजित विध्वंस है, संविधान का, संप्रभुता का, और एक व्यवस्थित समाज का।

राष्ट्रीय अस्मिता बनाम अराजकता, अमेरिका को चुनना होगा

जब शहरों को ‘संघीय पकड़’ से बचाने के लिए राज्य सरकारें केंद्रीय कानून का विरोध करें, तो यह केवल अराजकता ही नहीं, बल्कि एक संविधान के भीतर एक छद्म देश बनाने जैसा है।

लॉस एंजिल्स अब ‘सिटी ऑफ एंजेल्स’ की जगह, ‘सिटी ऑफ बर्निंग ब्रिगेड्स’ बन चुकी है, जहाँ उग्र भीड़ पत्थर फेंकती है, आग लगाती है, और पुलिस चुपचाप मूकदर्शक बनी रहती है।

डोनाल्ड ट्रंप की असली परीक्षा

यदि किसी देश का नागरिक होना अब केवल एक औपचारिकता बन जाए, और अवैध घुसपैठ ‘मानवाधिकार’ कहलाने लगे, तो संविधान का अर्थ क्या रह जाएगा?

क्या दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र को अब यह सोचने की ज़रूरत नहीं कि वह अपने ही देश में किन्हें “घर” कहने की इजाजत देता है? क़ानून को भावुकता निगल जाए तो व्यवस्था बंधक बन जाती है। यह परीक्षा अपने घर में ट्रंप को देनी है जो दुनिया का झूठा चौधरी बनने का सपना पाले हैं।

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Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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