ब्लैक बजट: 1 फरवरी 2026 को पेश किए गए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के 9वें केंद्रीय बजट ने विकसित भारत की सोच, 50 लाख रोजगारों और आत्मनिर्भरता के भरोसे के साथ देश को भविष्य की नई दिशा दिखाई है।
लेकिन अगर इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो एक ऐसा दौर भी मिलता है जब भारत आर्थिक अंधकार में डूबा हुआ था।
साल 1973, इंदिरा गांधी का शासनकाल और वह बदनाम ब्लैक बजट, जिसने देश को भुखमरी, महंगाई और कर्ज की दलदल में धकेल दिया था।
आज के सशक्त भारत और उस दौर की लाचारी के बीच फर्क सिर्फ समय का नहीं, बल्कि नीतियों और नेतृत्व का है।
क्या था आखिर ब्लैक बजट?
साल 1973 का बजट भारतीय आर्थिक इतिहास का सबसे डरावना अध्याय माना जाता है। तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंतराव बी. चव्हाण द्वारा पेश किए गए इस बजट में विकास की नहीं, बल्कि 550 करोड़ रुपये के भारी राजकोषीय घाटे की घोषणा थी।
उस समय यह घाटा इतना बड़ा था कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ ही टूट गई थी। राजकोषीय घाटा किसी भी सरकार की आर्थिक नाकामी का आईना होता है यानी कमाई कम और खर्चा बेहिसाब करना।
इंदिरा गांधी के शासन में आर्थिक अनुशासन पूरी तरह गायब था। हालात ऐसे थे कि सरकार की स्थिति आमदनीअठन्नी और खर्चा रुपैया जैसी हो गई थी।
यही वजह थी कि इस बजट को ब्लैक बजट कहा गया, जिसने आने वाले वर्षों में महंगाई और गरीबी की नींव रख दी।
क्या होता है राजकोषीय घाटा?
आसान शब्दों में बता दें कि फिस्कल डेफिसिट वह अंतर है जो सरकार की कमाई और खर्च के बीच होता है।
मान लीजिए सरकार की कुल आय ₹100 है, लेकिन खर्च ₹120 कर दिए गए तो ₹20 का जो अंतर है, वही राजकोषीय घाटा कहलाता है।
इस घाटे को पूरा करने के लिए सरकार कर्ज लेती है, जिसका बोझ जनता पर पड़ता है। 1973 में यही घाटा भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ज़हर बन गया था।
भारत को पड़ी एक साथ तिहरी मार
इंदिरा गांधी सरकार ने अपनी आर्थिक विफलताओं का ठीकरा 1971 के युद्ध पर फोड़ा, लेकिन सच्चाई यह थी कि सरकार के पास कोई ठोस आर्थिक रणनीति नहीं थी।
युद्ध के बाद लगभग 1 करोड़ शरणार्थियों का बोझ देश पर पड़ा, मगर न तो कोई इमरजेंसी फंड था और न ही दूरदर्शी योजना थी।
रक्षा बजट को बढ़ाकर 1600 करोड़ रुपये कर दिया गया, जबकि आम जनता भूख से जूझ रही थी। हालात तब और बदतर हो गए जब 1972–73 में भीषण सूखा पड़ा।
कृषि नीति की विफलता के चलते फसलें तबाह हो गईं, गांवों में भुखमरी फैल गई और लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए।
विदेशों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर भारत
देश के पास खाने के लिए अनाज तक नहीं बचा। मजबूरी में भारत को 20 लाख टन अनाज आयात करना पड़ा, जिस पर 160 करोड़ रुपये खर्च हुए। इससे विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली हो गया।
यह वही दौर था जब भारत आत्मनिर्भर बनने के बजाय दूसरों पर निर्भर हो गया और इसकी जड़ गलत नीतियां और कमजोर नेतृत्व था।
राष्ट्रीयकरण का दिखावा
अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए इंदिरा गांधी सरकार ने राष्ट्रीयकरण को हथियार बनाया। कोयला खदानें, तांबा कंपनियां और बीमा क्षेत्र सरकार के कब्जे में ले लिए गए।
कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण पर 56 करोड़ रुपये झोंक दिए गए, लेकिन इसका फायदा जनता को नहीं मिला। उल्टा, सरकारी नियंत्रण के साथ भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता बढ़ती चली गई।
बिजली संकट और गहरा गया और उद्योग ठप होते चले गए। सूखा राहत के नाम पर 220 करोड़ रुपये खर्च करने के दावे किए गए, लेकिन ज़मीनी हकीकत में लोग भूख से मरते रहे।
1973 का बजट दरअसल उस सरकार का दोष था, जो आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह विफल हो चुकी थी।
ब्लैक बजट से आत्मनिर्भर भारत बनने का सफ़र
आज अगर हम निर्मला सीतारमण के बजट को देखें, तो तस्वीर बिल्कुल इसके विपरीत नज़र आती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत आज आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव पर खड़ा है।
जहां 1973 में भारत अनाज और कर्ज के लिए विदेशों पर निर्भर था, वहीं आज भारत अनाज, तकनीक और वैक्सीन दुनिया को निर्यात कर रहा है।
आज बजट का पैसा हाईवे, बंदरगाह, रेलवे, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टार्टअप्स पर खर्च हो रहा है ना कि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है।
मध्यम वर्ग को टैक्स से राहत मिल रही है और छोटे व्यापारियों को आगे बढ़ने का मौका मिल रहा है।
बेबसी से बॉस बनने तक का सफर
1973 का ब्लैक बजट भारत के लिए एक चेतावनी था कि गलत नीतियां देश को कैसे घुटनों पर ला सकती हैं।
वहीं, आज का भारत इस बात का उदाहरण है कि सही नेतृत्व और स्पष्ट विज़न देश को विश्व शक्ति बना सकता है।
इंदिरा गांधी का दौर आर्थिक अंधकार का प्रतीक था, जबकि मोदी युग आशा, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का सूर्योदय है। भारत अब झुकने वाला देश नहीं, बल्कि दुनिया को दिशा दिखाने वाली शक्ति बन चुका है।
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