बिल गेट्स
वैश्वीकरण के इस दौर में हमने जिन लोगों को मसीहा मानकर सिर आँखों पर बैठाया, जब उनके चेहरों से नकाब उतरते हैं तो उसके पीछे छिपी दरिंदगी को देखर रूह काँप जाती है। पश्चिमी जगत ने हमेशा से ही अपनी श्रेष्ठता और तथाकथित मानवतावाद का ढोल पीटकर तीसरी दुनिया के देशों को भ्रमित करने का प्रयास किया है।
जेफ्रे एपस्टीन की फाइलों के खुलने के बाद जिस एक नाम ने पूरी दुनिया को सबसे ज्यादा चौंकाया है, वह कोई और नहीं बल्कि माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक और दुनिया के सबसे बड़े कथित दानवीर बिल गेट्स का है।
एपस्टीन फाइल में किसका नाम आया और किसका नहीं, यह मात्र कौतूहल का विषय हो सकता है, लेकिन जब एक ऐसे व्यक्ति का नाम सामने आता है जो पूरी दुनिया की स्वास्थ्य नीतियों को प्रभावित करता है, तो यह चिन्ता का नहीं बल्कि अस्तित्व के संकट का विषय बन जाता है।
बिल गेट्स की छवि एक सौम्य, तकनीकी विशेषज्ञ और मानवता के रक्षक की गढ़ी गई थी, लेकिन एपस्टीन के टापू से जो सच छनकर बाहर आ रहा है, वह बताता है कि सूट-बूट और चमकती दुनिया के पीछे का सच कितना वीभत्स और घृणित हो सकता है।
एपस्टीन का टापू: विलासिता नहीं, नृशंसता का अड्डा
जेफ्रे एपस्टीन का वह निजी टापू, जिसे पश्चिमी मीडिया ने अय्याशी का अड्डा कहकर हल्का करने की कोशिश की, वास्तव में वह मासूमियत के कत्ल का एक बूचड़खाना था।
लगभग 250 नाबालिग लड़कियों ने जो गवाही दी है और जो दस्तावेज सामने आए हैं, वे किसी भी संवेदनशील इंसान की नींद उड़ाने के लिए काफी हैं।
कल्पना कीजिए उस दृश्य की जहाँ दस-दस साल की मासूम बच्चियों के साथ दिन में तीन-तीन बार दुष्कर्म किया जाता था। जो वीडियो और साक्ष्य सामने आ रहे हैं, उनमें एक डरी-सहमी बच्ची एक किचन के कमरे की तरफ भाग रही है और दरिंदे उसे शिकार की तरह पकड़ रहे हैं।
यह मात्र यौन शोषण का मामला नहीं है, बल्कि इससे भी आगे जाकर वहाँ नाबालिग बच्चियों के मांस भक्षण तक की बातें सामने आई हैं, जो यह सिद्ध करती हैं कि धन और सत्ता के नशे में चूर ये लोग इंसानियत के स्तर से गिरकर पैशाचिक प्रवृत्तियों के गुलाम हो चुके हैं।
प्रश्न यह उठता है कि बिल गेट्स जैसा व्यक्ति, जो दुनिया भर में बच्चों को पोलियो और कुपोषण से बचाने का दावा करता है, वह ऐसे नृशंस कृत्यों के केंद्र में क्या कर रहा था? वह उस पार्टी का हिस्सा क्यों था जहाँ मानवता को शर्मसार करने वाले खेल खेले जा रहे थे?
यह वही बिल गेट्स है जिसे दुनिया भर की मीडिया ने एक संत का दर्जा दे रखा है। लेकिन यह दोहरा चरित्र अब दुनिया के सामने है। एक तरफ वह कैमरों के सामने टीके और दवाइयाँ बाँटकर मसीहा बनता है, और दूसरी तरफ अंधेरे कमरों में वह उन कुकृत्यों का साक्षी और भागीदार बनता है जिन्हें शब्दों में बयां करना भी पाप लगता है।
जो व्यक्ति हजारों नाबालिग बच्चियों के सामूहिक बलात्कार और शोषण के तंत्र में शामिल हो, उसे मानवतावादी कहना न केवल शब्द का अपमान है, बल्कि उन पीड़ित बच्चियों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।
भारत और अफ्रीका: गेट्स के लिए प्रयोगशाला या देश?
बिल गेट्स की संस्था ‘बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन’ दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) माना जाता है। लेकिन इस फाउंडेशन की आड़ में जो खेल खेला जा रहा है, वह चिकित्सा के नाम पर एक गहरा षड्यंत्र है।
गेट्स फाउंडेशन का काम करने का तरीका यह है कि कोई भी बड़ी दवा कंपनी सीधे तौर पर किसी संदिग्ध दवा का ट्रायल गरीब देशों के नागरिकों पर नहीं कर सकती क्योंकि कानून आड़े आता है।
ऐसे में यह फाउंडेशन एक मध्यस्थ की भूमिका निभाता है और ‘परोपकार’ के नाम पर उन ट्रायलों को अंजाम देता है। इसका सबसे भयावह उदाहरण हमारे अपने देश भारत में देखने को मिला है।
वर्ष 2009-10 के दौरान, गेट्स फाउंडेशन द्वारा वित्तपोषित संस्था ‘पाथ’ (PATH) ने आंध्र प्रदेश और गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में एचपीवी (HPV) वैक्सीन के ट्रायल किए थे।
इस ट्रायल की हकीकत यह थी कि इसमें शामिल हजारों गरीब और आदिवासी लड़कियों से न तो कोई सहमति ली गई थी और न ही उन्हें इसके दुष्प्रभावों के बारे में बताया गया था।
परिणाम यह हुआ कि कई बच्चियों की जान चली गई और सात मौतों की पुष्टि आधिकारिक रूप से हुई। यह मामला इतना गंभीर था कि भारत की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस पूरे घटनाक्रम की कड़ी आलोचना की थी और इसे अनैतिक करार दिया था।
समिति ने पाया कि नियमों की धज्जियाँ उड़ाई गईं और गरीब भारतीय नागरिकों को प्रयोग के लिए जानवरों की तरह इस्तेमाल किया गया। लेकिन विडंबना देखिए कि बिल गेट्स का प्रभाव और धनबल इतना अधिक है कि इस मामले को कभी मुख्यधारा का मुद्दा बनने ही नहीं दिया गया।
भारत की संप्रभुता और हमारे नागरिकों के जीवन के साथ हुए इस खिलवाड़ को ‘चैरिटी’ के नाम पर रफा-दफा कर दिया गया।
चिकित्सा अनुसंधान के नाम पर औपनिवेशिक मानसिकता
बिल गेट्स ने हाल ही में एक बयान दिया था जिसमें उन्होंने कहा कि “भारत और अफ्रीका चिकित्सा अनुसंधान के लिए प्रयोगशालाएँ हैं।” यह कथन उस औपनिवेशिक और सामंतवादी मानसिकता का परिचायक है जो आज भी पश्चिमी अभिजात वर्ग के मनों में बसी हुई है।
उनके लिए भारत और अफ्रीका के लोग जीते-जागते इंसान नहीं, बल्कि ‘गिनी पिग’ हैं जिन पर वे अपने रसायनों और टीकों का परीक्षण कर सकें। यह सोचना कि भारत जैसे विशाल और प्राचीन सभ्यता वाले देश के नागरिकों का जीवन केवल उनके प्रयोगों के लिए है, यह दर्शाता है कि वे हमें किस हेय दृष्टि से देखते हैं।
गेट्स का यह नेक्सस केवल एक एनजीओ तक सीमित नहीं है। वह दुनिया की कई बड़ी फार्मास्युटिकल कंपनियों में भागीदार है। यह हितों का एक ऐसा टकराव (Conflict of Interest) है जिसे जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है।
एक तरफ गेट्स फाउंडेशन स्वास्थ्य नीतियों को निर्धारित करता है, और दूसरी तरफ जिन कंपनियों में गेट्स का पैसा लगा है, वही कंपनियाँ उन नीतियों के तहत दवाइयाँ और टीके बेचती हैं।
यह परोपकार नहीं, बल्कि शुद्ध व्यापार है जो लाशों के ढेर पर खड़ा किया गया है। सॉफ्टवेयर कंपनी का मालिक अचानक से दुनिया का डॉक्टर कैसे बन गया, यह प्रश्न हर जागरूक नागरिक को पूछना चाहिए।
उसका उद्देश्य केवल बीमारी खत्म करना नहीं, बल्कि दुनिया की आबादी के स्वास्थ्य डेटा और उनके शरीर पर नियंत्रण करना प्रतीत होता है। जो व्यक्ति कथित तौर पर अपनी पत्नी को भी चुपके से दवाइयां खिला सकता है, जैसा कि कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है, वह अनजान देशों के करोड़ों लोगों के साथ क्या कर सकता है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी और भविष्य का संकट
इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक निराशाजनक भूमिका हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और मीडिया की है। जब मेरे एक वरिष्ठ डॉक्टर मित्र ने मुझे सलाह दी कि “गेट्स पर कुछ मत बोलो, बड़े खतरनाक लोग हैं, हर जगह उनके लोग हैं,” तो यह केवल एक चेतावनी नहीं थी, बल्कि यह उस डर का प्रमाण था जो इस नेक्सस ने फैला रखा है।
यह डर बताता है कि सिस्टम किस कदर इनके नियंत्रण में है। लेकिन अब समय आ गया है कि इस डर को त्यागा जाए। अगर हम आज भी चुप रहे, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक गुलाम मानसिकता और असुरक्षित भविष्य सौंपकर जाएंगे।
जो लोग गेट्स को आज भी विकास का देवता मानते हैं, वे या तो अज्ञानी हैं या फिर जानबूझकर सच से आँखें मूंद रहे हैं। एपस्टीन की फाइलें केवल कागज के टुकड़े नहीं हैं, वे उस सड़े-गले सिस्टम का सबूत हैं जो हमारे और आपके जीवन के फैसलों को नियंत्रित कर रहा है।
हमें यह समझना होगा कि कोई भी विदेशी व्यापारी या संस्था बिना किसी स्वार्थ के हमारे देश पर अरबों डॉलर नहीं लुटाती। भारत को अपनी चिकित्सा नीतियों और अनुसंधान में आत्मनिर्भरता लानी होगी।
हमें अपनी संसदीय समितियों की रिपोर्टों को धूल खाने के लिए नहीं छोड़ना चाहिए बल्कि उन पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। नाबालिग बच्चियों का मांस खाने और उनका शोषण करने वाले दरिंदों के खिलाफ अगर हम आज भी आवाज नहीं उठा सकते, तो हमें खुद को सभ्य समाज कहने का कोई अधिकार नहीं है।
बिल गेट्स जैसे लोग कानून और सरकारों से ऊपर नहीं हो सकते। यह लड़ाई केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस सोच के खिलाफ है जो मानवता को वस्तु और व्यापार का साधन समझती है। अब प्रश्न पूछने का समय है, जवाब मांगने का समय है और इन मुखौटों को नोच फेंकने का समय है।

