Thursday, February 12, 2026

कांग्रेस का ठप्पा बना मुसीबत, शकील अहमद ने बताई बिहार में कांग्रेस की बेइज्जती की दास्तान

कांग्रेस को इसलिए छिपाना पड़ा मुंह

शकील अहमद की स्वीकारोक्ति से उजागर हुई कांग्रेस की राजनीतिक सच्चाई

जब किसी राजनीतिक दल की वास्तविक स्थिति को समझना हो, तो विरोधियों के आरोपों से अधिक महत्त्वपूर्ण उसके अपने नेताओं की स्वीकारोक्तियाँ होती हैं।

बिहार में कांग्रेस की जमीनी हकीकत को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे श्री शकील अहमद का हालिया बयान इसी श्रेणी में आता है। एक पॉडकास्ट में दिया गया उनका वर्णन केवल एक चुनावी प्रसंग नहीं है, बल्कि बिहार में कांग्रेस के सामाजिक और राजनीतिक अवसान का जीवंत प्रमाण है।

उपचुनाव की घटना और कांग्रेस का गणित

शकील अहमद के अनुसार बिहार की एक विधानसभा सीट पर हुए मूल चुनाव में एक निर्दलीय प्रत्याशी को दस हज़ार से अधिक वोट प्राप्त हुए थे। बाद में उस सीट पर विजयी उम्मीदवार का निधन हो गया, जिसके कारण वहां उपचुनाव कराना पड़ा।

इस उपचुनाव को कांग्रेस ने एक अवसर के रूप में देखा। पार्टी नेतृत्व का आकलन था कि जिस व्यक्ति को निर्दलीय रहते हुए दस हज़ार से अधिक वोट मिले थे, यदि उसे कांग्रेस का टिकट दे दिया जाए, तो उसके अपने आधार वोट में कांग्रेस के पारंपरिक वोट जुड़ जाएंगे और जीत सुनिश्चित हो जाएगी।

यह वही पुराना कांग्रेसीय भ्रम था, जिसमें संगठन की वास्तविक ताकत को आंकने के बजाय केवल नाम और प्रतीक पर भरोसा किया जाता है। बिहार जैसे राज्य में, जहां जाति, जमीन और स्थानीय विश्वसनीयता निर्णायक होती है, वहां यह गणित शुरू से ही खोखला था।

नतीजे जो कांग्रेस के लिए अपमानजनक बने

जब उपचुनाव के परिणाम आए, तो कांग्रेस का यह पूरा गणित उलट गया। जिस प्रत्याशी को निर्दलीय रहते हुए 10000 से अधिक मत मिले थे, वही व्यक्ति कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर महज़ लगभग 3400 वोट ही प्राप्त कर सका। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि उसी सीट पर नोटा को लगभग दो हज़ार वोट मिले।

यह आंकड़ा केवल हार का नहीं, बल्कि जन अस्वीकार का संकेत था। मतदाताओं ने स्पष्ट कर दिया कि वे व्यक्ति को स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन कांग्रेस के चुनाव चिन्ह और ठप्पे को नहीं। कांग्रेस का नाम जुड़ते ही प्रत्याशी की स्वीकार्यता समाप्त हो गई।

कांग्रेस का ठप्पा: वोट बढ़ाने की नहीं, घटाने की पहचान

शकील अहमद के कथन का भाव अत्यंत कठोर लेकिन सत्य है। बिहार में स्थिति यह हो चुकी है कि किसी प्रत्याशी पर यदि कांग्रेस का ठप्पा लग जाए, तो उसके वोट बढ़ने के बजाय तेजी से घट जाते हैं। कांग्रेस अब वोट ट्रांसफर करने वाली पार्टी नहीं रही, बल्कि वोट काटने और प्रत्याशी को कमजोर करने वाली पहचान बन चुकी है।

यह स्थिति किसी एक चुनाव या एक सीट तक सीमित नहीं है। यह दशकों की संगठनात्मक उपेक्षा, वैचारिक शून्यता और जमीनी कार्यकर्ताओं से कटाव का परिणाम है। बिहार में कांग्रेस न तो सामाजिक न्याय की विश्वसनीय आवाज रही, न ही विकास की प्रभावी ताकत।

तेजस्वी यादव और कांग्रेस के साथ भ्रमपूर्ण सपने

इसी पृष्ठभूमि में शकील अहमद का संकेत और अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है। बिहार में कांग्रेस की इस हालत के बावजूद, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर मुख्यमंत्री बनने का सपना देखा। यह सपना राजनीतिक मजबूरी का परिणाम हो सकता है, लेकिन जमीनी सच्चाई से इसका कोई मेल नहीं बैठता।

जिस दल का नाम जुड़ते ही प्रत्याशी के वोट हजारों से सिमटकर सैकड़ों में आ जाएं, उसके साथ सत्ता का गणित खड़ा करना आत्मघाती रणनीति के अलावा कुछ नहीं है। कांग्रेस अब बिहार में गठबंधन की ताकत नहीं, बल्कि गठबंधन पर बोझ बन चुकी है।

बिहार में कांग्रेस का वास्तविक संकट

शकील अहमद का बयान दरअसल कांग्रेस के भीतर चल रहे आत्मस्वीकार का एक छोटा सा अंश है। बिहार में कांग्रेस न संगठन के स्तर पर जीवित है, न वैचारिक स्तर पर प्रासंगिक। उसके पास न विश्वसनीय नेतृत्व है, न जमीनी कैडर, और न ही ऐसा जनाधार जो चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सके।

जब कोई पार्टी नोटा से भी कम आकर्षक हो जाए, तो यह केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना के पतन का संकेत होता है। बिहार में कांग्रेस इसी दौर से गुजर रही है, और शकील अहमद की बात इस कड़वी सच्चाई पर लगा हुआ वह आईना है, जिसे अब नजरअंदाज करना संभव नहीं है।

जब कांग्रेस का नाम ही प्रत्याशी के लिए अभिशाप बन जाए, तब सवाल किसी एक सीट का नहीं रहता, सवाल उस पार्टी के राजनीतिक अस्तित्व का हो जाता है।

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Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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