बाबूलाल कटारा ने 1.20 करोड़ में RPSC में खरीदा पद: आरपीएससी के पूर्व सदस्य बाबूलाल कटारा ने ईडी की पूछताछ में स्वीकार किया कि आरपीएससी सदस्य बनने के लिए 1.20 करोड़ रुपये की डील हुई थी।
यह रकम तत्कालीन डूंगरपुर जिला कांग्रेस अध्यक्ष दिनेश खोड़निया को दी गई।
कटारा ने यह भी माना कि आरएएस, कृषि अधिकारी और कॉलेज लेक्चरर जैसी प्रतिष्ठित भर्तियों के इंटरव्यू में अभ्यर्थियों से पैसे लेकर उन्हें अनुचित लाभ दिया गया।
इतना ही नहीं, कटारा ने बताया कि सदस्य बनने के बाद हर साल 20 लाख रुपये देने की बात तय हुई थी और कई कांग्रेस नेताओं की सिफारिश के बाद उसका चयन हुआ।
गहलोत सरकार पर खड़े करता है गंभीर सवाल
यह कबूलनामा सीधे तौर पर गहलोत सरकार के पूरे भर्ती सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में एक के बाद एक घोटाले सामने आते रहे।
उसी दौर में पेपर लीक की एक पूरी “इंडस्ट्री” खड़ी होती दिखी—REET 2021, SI भर्ती 2021, शिक्षक भर्ती लेवल-1 समेत लगभग हर बड़ी परीक्षा कथित तौर पर विवादों में रही।
2025 में SI भर्ती पेपर लीक मामले में गहलोत के पूर्व PSO राजकुमार यादव और उसके बेटे की गिरफ्तारी ने इन आरोपों को और मजबूती दी।
मीड डे मील के नाम पर राशन बांटकर घोटाला
भ्रष्टाचार की जड़ें सिर्फ परीक्षाओं तक सीमित नहीं रहीं। गहलोत सरकार के समय शिक्षा विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग खुली लूट का जरिया बन गई।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में राजस्थान को ट्रांसफर भ्रष्टाचार में नंबर-1 बताया गया। कोरोना काल में जब स्कूल बंद थे, तब भी मिड-डे मील के नाम पर राशन कागजों में बांटकर घोटाला किया गया।
RAS-2018 में बहू के भाई-बहन को 80 अंक मिले
नेपोटिज्म की बात करें तो RAS में डोटासरा परिवार का मामला आज भी सवालों के घेरे में है। RAS-2018 में उनकी बहू के भाई-बहन को इंटरव्यू में 80-80 अंक मिले, जबकि टॉपर को भी इससे कम नंबर थे।
इससे पहले RAS-2016 में उनकी बहू को भी इंटरव्यू में 80 अंक दिए गए थे। भाजपा ने इसे महज़ संयोग नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग का मामला बताया।
इसके अलावा जल जीवन मिशन में 900 से 1250 करोड़ के कथित घोटाले, फोन टैपिंग कांड, आईटी विभाग में हजारों करोड़ की अनियमितताएं और RCA में वैभव गहलोत के कार्यकाल पर लगे आरोप—कांग्रेस शासन में विवादों की सूची लगातार लंबी होती चली गई।
बाबूलाल कटारा का मामला, कांग्रेस पर सवाल
कांग्रेस इन सभी मामलों को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताती है, लेकिन सवाल यही है कि अगर सब कुछ झूठ है, तो कबूलनामे, गिरफ्तारियां और जांच एजेंसियों की सक्रियता क्यों?
बाबूलाल कटारा का मामला एक बार फिर कांग्रेस शासन के उस सिस्टम पर सवाल खड़े करता है, जहां नौकरियां बिकती हैं, इंटरव्यू नीलाम होते हैं और मेहनती युवाओं का भविष्य दांव पर लगा दिया जाता है।
अब देखना यह है कि यह लड़ाई सिर्फ आरोपों तक सीमित रहती है या सच में सिस्टम की जड़ तक पहुंचती है

