Thursday, January 29, 2026

असम सरकार का बड़ा फैसला: 18 साल से ऊपर नहीं बन पाएगा आधार कार्ड, घुसपैठ रोकने के लिए उठाया कदम

असम में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ पर लगाम कसने के लिए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने ऐतिहासिक कदम उठाया है।

अब राज्य में 18 वर्ष से ऊपर के लोगों का आधार कार्ड बनवाना बंद होगा। हालांकि, SC, ST और चाय बागान समुदाय से जुड़े लोगों को एक वर्ष की छूट दी जाएगी।

सरमा ने 21 अगस्त 2025 को मंत्रिमंडल की बैठक के बाद ऐलान किया कि यह निर्णय अक्टूबर के पहले सप्ताह से लागू होगा।

जिनके पास अभी आधार कार्ड नहीं है, वे सितंबर महीने में आवेदन कर सकते हैं। लेकिन इसके बाद सामान्य नागरिकों के लिए यह रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा।

आधार सैचुरेशन 103% पर पहुँचा, घुसपैठियों पर गहरा शक

मुख्यमंत्री ने बताया कि असम में आधार सैचुरेशन 103% पहुँच गया है, यानी यहाँ की आबादी से ज्यादा आधार कार्ड जारी हो चुके हैं।

इसका सीधा अर्थ यह है कि राज्य में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठियों को भी आधार कार्ड मिल चुका है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि SC, ST और चाय बागान मजदूर समुदाय को राहत इसलिए दी गई है क्योंकि इन वर्गों में अभी आधार कवरेज केवल 96% है।

हिमंता ने कहा कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि कोई भी अवैध विदेशी असम में प्रवेश कर भारतीय नागरिकता का दावा न कर सके।

अब केवल DC देंगे आधार कार्ड, होगी सख्त जाँच

सरमा ने ऐलान किया कि अब केवल जिला आयुक्त (DC) को ही दुर्लभ परिस्थितियों में आधार कार्ड जारी करने का अधिकार होगा।

उन्होंने कहा कि एक माह के भीतर SDC या सर्किल ऑफिसर आधार कार्ड जारी नहीं कर पाएँगे। केवल DC ही यह प्रक्रिया पूरी कर सकेंगे।

इसके लिए DC को पहले विशेष शाखा (SB) की रिपोर्ट और विदेशी न्यायाधिकरण की जाँच रिपोर्ट को अनिवार्य रूप से देखना होगा।

इस कदम से नकली दस्तावेज़ों के आधार पर आधार कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया लगभग असंभव हो जाएगी।

बदलती डेमोग्राफी: 2041 तक बराबर होंगे हिंदू-मुस्लिम

सीएम सरमा ने चेतावनी दी थी कि असम में जनसांख्यिकीय संतुलन तेजी से बदल रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल आबादी 3.12 करोड़ थी।

जिसमें 34.22% मुस्लिम और 61.47% हिंदू थे। लेकिन 2041 तक मुस्लिम आबादी हिंदुओं के बराबर हो जाएगी।

उन्होंने कहा था कि असम में केवल 3% मुस्लिम ही असमिया मूल के हैं जबकि 31% मुस्लिम बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं।

अगर यही प्रवृत्ति जारी रही तो 2041 तक मुस्लिम आबादी 50% हो जाएगी और हिंदू समुदाय राज्य में अल्पसंख्यक बन जाएगा।

जिलों में बढ़ी मुस्लिम आबादी, ‘भूमि जिहाद’ का आरोप

हिमंता ने बताया कि 2001 में असम के 23 जिलों में 6 मुस्लिम बहुल थे जबकि 2011 तक यह संख्या 9 तक पहुँच गई।

उन्होंने कहा कि मुस्लिम आबादी योजनाबद्ध तरीके से सरकारी और जंगलों की जमीन पर कब्जा कर रही है।

सरमा के अनुसार यह केवल ‘भूमि जिहाद’ नहीं बल्कि असम की सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान को खत्म करने की साजिश है।

अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले 20 वर्षों में असम के मूल निवासी अपनी ही भूमि पर अल्पसंख्यक बन जाएँगे।

घुसपैठियों से छुड़ाई गई 1.29 लाख बीघा जमीन

सीएम सरमा ने बताया कि 2021 से अब तक घुसपैठियों के कब्जे से 1.29 लाख बीघा जमीन मुक्त कराई गई है।

उन्होंने दावा किया कि असम में लगभग 29 लाख बीघा जमीन पर बांग्लादेशी और संदिग्ध नागरिकों का अवैध कब्जा है।

उन्होंने कहा कि दरंग जिले से शुरू हुए अभियान को बोरसोल्ला, लुमडिंग, बुरहापहाड़, पाभा, बतद्रा, चापर और पैकन में भी चलाया गया।

कब्जा छुड़ाई गई जमीन का एक बड़ा हिस्सा अब जंगल बनाने और राज्य की जनता के उपयोग के लिए रखा जा रहा है।

असम में घुसपैठ पर सरकार का कड़ा रुख

हिमंता बिस्वा सरमा ने बार-बार दोहराया है कि उनका लक्ष्य असम को बांग्लादेशी घुसपैठियों से पूरी तरह मुक्त कराना है।

आधार कार्ड पर प्रतिबंध का फैसला इसी दिशा में उठाया गया ठोस कदम माना जा रहा है।

सरकार का मानना है कि नकली दस्तावेजों और आधार कार्ड की वजह से घुसपैठियों को नागरिकता जैसे संवैधानिक अधिकारों तक पहुँच आसान हो जाती थी।

लेकिन अब यह प्रक्रिया सख्त कर दी गई है, जिससे राज्य की जनसांख्यिकी और सुरक्षा को स्थायी राहत मिल सकेगी।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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