अशोक गहलोत
अशोक गहलोत को राजनीति का जादूगर कहा जाता है, कई बार कांग्रेस को उन्होंने जिताया है। परंतु कुछ लोगों का कहना है कि हाल के कुछ चुनावों पर नजर डालें तो अशोक गहलोत कांग्रेस के लिए जादूगर नहीं पनौती बनते नजर आ रहे हैं।
जिस जिस राज्य चुनाव में कांग्रेस ने अशोक गहलोत को जिम्मेदारी सौंपी, वहां वहां कांग्रेस हारती चली गई। ऐसे में अशोक गहलोत पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
गुजरात में पर्यवेक्षक बने अशोक गहलोत, कांग्रेस की हुई हार
गुजरात विधानसभा चुनाव 2022 से पहले कांग्रेस ने पूरी गंभीरता से अशोक गहलोत को वरिष्ठ पर्यवेक्षक नियुक्त किया था, ताकि संगठनात्मक खामियों को संभाल कर चुनावी रणनीति मजबूत बनाई जा सके।
अभियान को नए सिरे से दिशा देने की यह कोशिश नतीजों में सफल नहीं हुई और पार्टी राज्य में ऐतिहासिक पराजय का सामना कर बैठी।
भाजपा ने रिकॉर्ड सीटें जीतकर विधानसभा में एकतरफा स्थिति बना ली, जबकि कांग्रेस सत्ता परिवर्तन का अवसर तलाशने में भी पीछे रह गई।
दो वर्ष बाद हरियाणा में अशोक गहलोत की नियुक्ति, परिणाम फिर कांग्रेस के प्रतिकूल
2024 के हरियाणा विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने वही प्रयोग दुबारा किया और गहलोत को चुनाव की पूरी निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी।
उम्मीद थी कि उनकी अनुभव-संपन्न भूमिका संगठन में ऊर्जा भरेगी, परंतु प्रचार के अंत तक पार्टी अपनी रणनीतियों में सामंजस्य नहीं बैठा सकी।
मतदान के बाद आए नतीजों में भाजपा ने सरकार बनाने में सफलता पाई और कांग्रेस अपने लक्षित जनाधार को निर्णायक रूप से सक्रिय करने में नाकाम रही।
लगातार दूसरी बार पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी के साथ जुड़ी हार ने पार्टी भीतर असहजता बढ़ाई।
बिहार चुनाव में गहलोत की उपस्थिति के बावजूद कांग्रेस निर्णायक संघर्ष से बाहर
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस नेतृत्व ने गहलोत पर भरोसा कायम रखते हुए उन्हें वरिष्ठ पर्यवेक्षक नियुक्त किया।
पार्टी को उम्मीद थी कि वह विभिन्न क्षेत्रीय समीकरणों को साधकर चुनावी प्रदर्शन सुधारेंगे, परंतु मतगणना ने यह आशा भी ध्वस्त कर दी।
भाजपा ने निर्णायक बढ़त लेकर सरकार बना ली और कांग्रेस तीसरे महत्वपूर्ण राज्य में भी स्पष्ट रूप से पराजित दिखी।
बिहार परिणामों ने यह धारणा और गहरी की कि गहलोत की मौजूदगी से पार्टी को अपेक्षित लाभ नहीं मिला।
तीन राज्यों की श्रृंखला ने कांग्रेस में अनकहे सवालों को जन्म दिया
गुजरात, हरियाणा और बिहार, इन तीनों राज्यों में गहलोत को वरिष्ठ पर्यवेक्षक बनाकर उतारा गया और तीनों जगह पार्टी सत्ता में आने से बहुत दूर रही। लगातार हार की यह श्रृंखला कार्यकर्ताओं और विश्लेषकों के बीच चर्चा का कारण बनी है।
राजनीतिक हलकों में यह टिप्पणी भी उभरने लगी कि जिस तरह बरखा दत्त को लेकर व्यंग्यपूर्ण उपमाएँ चलती हैं, उसी अंदाज़ में गहलोत को कांग्रेस के भीतर ‘मेल वर्जन’ की तरह देखा जाने लगा है, क्योंकि उनकी नियुक्ति के साथ ही हार का सिलसिला जुड़ता गया।

