Thursday, April 2, 2026

अक्षय तृतीया- 20 अप्रैल 2026 को ही शास्त्रसम्मत, भूलकर भी 19 अप्रैल को न मनाएं

अक्षय तृतीया

सूर्यसिद्धान्त अनुसार 19 अप्रैल को दोपहर 01:18 तक द्वितीया तिथि है। व 20 अप्रैल को प्रातः 10:56 बजे तक तृतीया प्राप्त है, जो रोहिणी नक्षत्र से संयुक्त है। 20 अप्रैल को सूर्योदयोपरांत 4 घण्टे 53 मिनट तृतीया मिल रही है, अतः 20 अप्रैल को ही अक्षय तृतीया है।

दृश्य गणित पंचांग में भी अक्षयतृतीया 20 अप्रैल को ही शास्त्रसम्मत है, परन्तु अधिकांश पंचांगों ने 19 अप्रैल का अशास्त्रीय निर्णय दिया है, जिसका समाधान आचार्य श्री आदित्यमोहन शर्मा, संपादक जयविनोदी जयपुर पंचांग ने अपने प्रस्तुत लेख में किया है। दृश्य पंचांग में 19 अप्रैल को प्रातः 10:49 से तृतीया आरंभ होगी जो 20 अप्रैल को प्रातः 07:27 तक रहेगी। 19 अप्रैल को प्रातः 07:10 तक भरणी और पश्चात् क्षय नक्षत्र कृत्तिका का अशुभ संयोग रहेगा। 20 अप्रैल को तृतीया में रोहिणी नक्षत्र व सोमवार का संयोग प्रातः काल से पूरे दिन रहेगा।

20 अप्रैल 2026 को ही होगी अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया में देवकर्म

अक्षय तृतीया में श्रीविष्णुपूजन, चन्दनशृंगार, गौरीव्रत, गंगास्नान, अक्षतों से विष्णुपूजन, यवों से हवन-पूजन, उदकुम्भ दान आदि देवकर्म कहे हैं और श्राद्ध तर्पण पितृकर्म में कहे हैं। देवों और पितरों के निमित्त अलग अलग धर्मघट का दान देवीपुराण में कहा है।

अक्षय तृतीया: धर्मसिंधु का प्रमाण

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तृतीयानिर्णय में कहा है, “तृतीया रम्भाव्रते पूर्वविद्धा ग्राह्या। रम्भाव्यतिरिक्तव्रतेषु त्रिमुहूर्तद्वितीया-विद्धां पूर्वी त्यक्त्वा परदिने त्रिमुहूर्तव्यापिनी ग्राह्या। पूर्वदिने त्रिमुहूर्तन्यूनद्वितीयावेधे परदिने त्रिमुहूर्तव्याप्त्यभावे पूर्वा ग्राह्या। पूर्वदिने त्रिमुहूर्तद्वितीयावेधे परदिने त्रिमुहूर्त्तन्यूनापि ग्राह्या। गौरीव्रते तु कलाकाष्ठादिपरिमितस्वल्पद्वितीयायुक्तापि निषिद्धा। परदिने कलाकाष्ठादिपरिमिता स्वल्पापि तृतीया परिग्राह्या।”

तृतीया रम्भा व्रत में पूर्वविद्धा ग्राह्य है। रम्भा को छोड़कर अन्य व्रतों में तीन मुहूर्त द्वितीया विद्धा पूर्वा को छोड़कर दूसरे दिन त्रिमुहूर्तव्यापिनी तृतीया लेना। यहाँ तीन स्थिति बताई हैं,

  1. यदि पहले दिन तीन मुहूर्त से न्यून द्वितीया के वेध हो और दूसरे दिन तीन मुहूर्त न रहने पर पूर्वा लेना।
  2. पहले दिन तीन मुहूर्त द्वितीया वेध होने पर दूसरे दिन त्रिमुहूर्त से कम होने पर भी परदिन की तृतीया ग्राह्य है।
  3. गौरीव्रत में कलाकाष्ठा आदि स्वल्प द्वितीया युक्त भी तृतीया निषिद्ध है। दूसरे दिन कला-काष्ठादि स्वल्प भी तृतीया ग्राह्य है।

अक्षय तृतीया: इस वर्ष दूसरी और तीसरी दोनों ही परिस्थिति लागू हो रही हैं। 19 अप्रैल को तीन मुहूर्त्त से अधिक द्वितीया वेध है अतः उसका ग्रहण नहीं हो सकता। अक्षय तृतीया गौरीव्रत ही है, अतः इसमें तो किंचिन्मात्र भी उदयव्यापी तृतीया ही ग्राह्य है।

धर्मसिंधु में कहा है, “अथ तृतीयायां चन्दनपूजा। यः करोति तृतीयायां कृष्णं चन्दनभूषितम्। वैशाखस्य सिते पक्षे स याच्युतमन्दिरम्।। इयं अक्षयतृतीयासंज्ञिका”, तृतीया में चन्दनपूजा आदि देवकृत्य को अक्षय तृतीया कहा है। इन देवकार्यों का निर्णय धर्मसिन्धुकार पहले ही बता चुके हैं। इसके बाद धर्मसिंधु ने श्राद्ध का विवेचन किया है। देखें धर्मसिंधु का क्या कहता है,

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अत्र युगादिश्राद्धमपिण्डकमनुष्ठेयम् । श्राद्धासंभवे तिलतर्पणमप्यत्र कार्यम् । अत्र शुक्लयुगादिकृत्यं पूर्वाह्ने कार्यम् । तत्रासंभवेऽपराह्नेऽपि । कृष्णयुगादिकार्य त्वपराह्ने इत्यादिमन्वादिप्रकरणोक्तो निर्णयः । द्वेधाविभक्तदिनपूर्वार्धे कदेशव्यापिनी दिनद्वये चेत् त्रिमुहूर्ताधिकव्याप्तिसत्त्वे परा, त्रिमुहूर्तन्यूनत्वे पूर्वा ।

मन्वादौ च युगादौ च ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः । व्यतीपाते वैधृतौ च तत्कालव्यापिनी क्रिया ॥ इति वचनेन साकल्यव्याप्तिवाक्यानामपवादात् श्राद्धादिकं तृतीयामध्ये एव कर्तव्यम् ।

अर्थात्, “इसमें पिण्डरहित युगादिश्राद्ध करे। श्राद्ध न करने पर तिल से तर्पण करना चाहिये। इसमें शुक्ल युगादिकार्य पूर्वाह्न में करना चाहिये। पूर्वाह्न में न हो सके तो अपराह्न में भी करे। कृष्ण युगादिकार्य तो अपराह्न में करे। ये सब बातें मन्वादि प्रकरण में निर्णीत हैं। दिन के दो भाग करने पर पूर्वार्ध के एकदेश में दो दिन में रहने वाली हो तो तीन मुहूर्त से अधिक व्यापिनी होने पर परा और तीन मुहूर्त से कम होने पर पूर्वा ग्राह्य है। ‘मन्वादि, युगादि, सूर्य चन्द्रमा के ग्रहण और व्यतिपात एवं वैधृति में उसी समय में रहने वाली तिथि में श्राद्ध करे, इस वचन से साकल्यव्याप्ति के वाक्यों का अपवाद होने से श्राद्ध आदि तृतीया के मध्य में ही करे।”

इससे यह स्पष्ट है कि धर्मसिंधु का ये वचन केवल अक्षय तृतीया के श्राद्धादि पितृकार्य के विषय में ही हैं, चन्दनपूजा, गौरीव्रत, विष्णुपूजन, गंगास्नान आदि देवकार्य एवं मांगलिक कार्यों के विषय में नहीं हैं, अतः पूर्वदिन में अक्षय तृतीया का निर्णय देना शास्त्रसम्मत नहीं है धर्मसिंधु के नाम पर धर्मसिंधु के ही मत के विपरीत निर्णय करना अनुचित है। यहाँ तक कि कई आचार्यों ने तो युगादि मन्वादि का श्राद्ध भी सूर्योदयव्यापिनी तिथि में माना है जैसा निर्णय सिन्धु का वचन आगे उद्धृत करेंगे।

अक्षय तृतीया: जयसिंहकल्पद्रुम का प्रमाण

अक्षय तृतीया: जयसिंहकल्पद्रुम में वैशाख शुक्ल तृतीया के लिए कहा है,

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वैशाखशुक्लतृतीया अक्षयतृतीया। इयं गौरीव्रते कलाकाष्ठादियुक्ताअप्युत्तरा कार्या। तदुक्तं निर्णयामृते नारदीये- “वैशाखे शुक्लपक्षे तु तृतीया रोहिणीयुता। दुर्लभा बुधवारेण सोमेनापि युता तथा॥ रोहिणीबुधयुक्तापि पूर्वविद्धाविवर्जिता। भक्त्या कृतापि मांधातः पुण्यं हन्ति पुराकृतम् ॥ गौरी विनायकोपेता रोहिणीबुधसंयुता। विनापि रोहिणीयोगात्पुण्यकोटिप्रदा सदा॥” इति। गौरीतृतीया विनायकचतुर्थी ।

अर्थात्, “वैशाख शुक्ल तृतीया को ‘अक्षय तृतीया’ कहते हैं। इस व्रत में तृतीया कला, काष्ठा मात्र भी मिले तो भी उत्तरा (अगली) करे। क्योंकि निर्णयामृत में नारदीय पुराण से कहा है, अर्थात् वैशाख शुक्लपक्ष की तृतीया रोहिणी युता करनी चाहिए, यह बुधवार सोमवार युक्त मिलनी दुर्लभ है। रोहिणी और बुधवार से युक्त भी तृतीया द्वितीया से विद्धा हो तो त्याज्य है। हे मान्धाता ! भक्ति से की हुई भी वह पूर्वविद्धा होने पर पूर्वपुण्य का नाश करती है और चतुर्थी से युक्त तृतीया चाहे रोहिणी और बुध से युक्त हो या चाहे रोहिणी से रहित ही क्यों न हो, तो भी वह कोटि पुण्य की देने वाली है। गौरी से तृतीया और विनायक से चतुर्थी समझे।”

अक्षय तृतीया: नारदपुराण, निर्णयसिन्धु, निर्णयामृत, स्मृत्यर्थसार का प्रमाण

अक्षय तृतीया के लिए निर्णयसिन्धु में भी निर्णयामृत और नारद पुराण के उपर्युक्त वचन उद्धृत हैं। अक्षय तृतीया युगादि तिथि भी है, इसके लिए निर्णयसिन्धु में फिर कहा,

स्मृत्यर्थसारेपि ‘युगादिमन्वादिश्राद्धेषु शुक्लपक्षे उदयव्यापिनी तिथिर्ग्राह्या। कृष्णपक्षेऽपराह्णव्यापिनी’ इति ॥ दिवोदासीये गोभिलः-“वैशाखस्य तृतीयां यः पूर्वविद्धां करोति वै। हव्यं देवा न गृह्णति कव्यं च पितरस्तथा” इति ॥”

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अर्थात्, निर्णयसिन्धु में स्मृत्यर्थसार के वचन से कहा है कि, “युगादि और मन्वादि शुक्लपक्षकी उदय व्यापिनी और कृष्णपक्षकी अपराह्णव्यापिनी ग्रहण करनी।” दिवोदासीय ग्रन्थ में गोभिल का वाक्य है कि, जो मनुष्य वैशाख की शुक्लतृतीया को पूर्वविद्धा में करता है उसके हव्य को देवता और कव्य को पितर स्वीकार नहीं करते।”

यहाँ युगादि के पितृकार्य में भी सूर्योदयव्यापिनी ग्रहण की है। निर्णयसिन्धु के मन्तव्य को स्पष्ट करते हुए संवत् २०२७ में वाराणसी से प्रकाशित टीका में लिखा है, “तत् स्वल्पा अपि परा। यदा परा न लभ्यते तदा द्वितीयाविद्धापि ग्राह्या। तदलाभे पूर्वा।” अर्थात् तृतीया स्वल्प भी मिले तो परा ग्रहण करे। परदिन में तृतीया बिलकुल न मिले तब द्वितीयाविद्धा का ग्रहण करे, ऐसा तृतीया के क्षय होने पर ही संभव है।

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नारद और ब्रह्मवैवर्त पुराण के वचनों द्वारा व्रत रत्नमालाकार की व्याख्या

ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया के रम्भा-तृतीया व्रत में ही तृतीया तिथि द्वितीया से युक्त ग्रहण की जाती है, इसके अतिरिक्त अक्षय-तृतीया आदि समस्त तृतीया व्रतों में यह गणयुक्ता अर्थात् चतुर्थीयुक्त ही ग्रहण की जाती है। यह ब्रह्मवैवर्त का वचन है। नारद पुराण ने भी “गौरीविनायकोपेता” कहकर अक्षय-तृतीया चतुर्थी से युक्त ही ग्रहण की है।

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रम्भाख्यां वर्जयित्वा तु तृतीयां द्विजसत्तम। अन्येषु सर्वकार्येषु गणयुक्ता प्रशस्यते ॥
“इति ब्रह्मवैवर्ताच्च । अतएव ब्रह्मर्क्षवेधनयुता रोहिणीनक्षत्रबुधवारयुता विधितिथ्यविद्धा द्वितीयावेधरहिता सा अक्षयदा अक्षयतृतीयाधिकफला भवति अत एव दुर्लभा विरलेतरा पूर्वोक्तिवचनात्।।      
– व्रत रत्नमाला

“यह ब्रह्मवैवर्त में कहा है, इसीलिए, जब ब्रह्मा के रोहिणी नक्षत्र और बुधवार से युक्त तृतीया हो, और वह द्वितीया-वेध से रहित हो, वही तिथि अक्षय फल देने वाली (अक्षयदा) कही जाती है; वह सामान्य अक्षय तृतीया से भी अधिक फलदायिनी होती है। इसी कारण वह अत्यन्त दुर्लभ और विरल कही गई है, जैसा कि पूर्वोक्त वचनों में कहा गया है।”

युगादि तिथि सदैव सूर्योदय में ही- देवीपुराण, तिथिनिर्णयः और कृत्यसार का प्रमाण

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वैशाखशुक्ला तृतीया तु युगादित्वादुदयगामिनी ग्राह्या तथाहि- देवीपुराणम्- युगाद्या वर्षवृद्धिश्च सप्तमी पार्वतीप्रिया। सूर्योदयमपेक्षन्ते न तत्र तिथियुग्मता।।

अर्थात् वैशाख शुक्लतृतीया तो युगादि होने से उदयगामिनी ग्राह्य है। देवीपुराण में कहा है, युगादि, वर्षवृद्धि और सप्तमी में सूर्योदयव्यापी तिथि की अपेक्षा होती है, तिथि युग्मता की नहीं।

20 अप्रैल को ही तृतीया, रोहिणी और सोमवार का दुर्लभ योग प्राप्त

19 अप्रैल को पूर्वविद्धा तृतीया तिथि का रोहिणी से संयोग प्राप्त नहीं हो रहा है, एवं पूर्वविद्धा की सर्वथा अप्रशस्तता शास्त्र में स्पष्ट है। 20 अप्रैल को प्रातःकाल 1 घण्टा 24 मिनट अर्थात् 3 घटी से भी अधिक समय तक तृतीया प्राप्त है, चतुर्थी तिथि एवं रोहिणी से संयुक्त होकर इसकी शुभता असंदिग्ध है। इस दिन सोमवार भी है जो शास्त्रों में अत्यंत दुर्लभ और शुभदायक कहा है, वह भी इसी दिन प्राप्त है। अतः 20 अप्रैल को अक्षय तृतीया करना शास्त्रसम्मत होगा।

अक्षय तृतीया: 20 अप्रैल को ही विवाह मुहूर्त्त भी प्राप्त हो रहा है क्योंकि 19 अप्रैल को क्षय कृत्तिका नक्षत्र में विवाह का मुहूर्त्त नहीं होता है। अतः समस्त मांगलिक कार्यों में 20 अप्रैल ही प्रशस्त है।

सूर्यसिद्धान्त अनुसार 19 अप्रैल को दोपहर 01:18 तक द्वितीया तिथि है। व 20 अप्रैल को प्रातः 10:56 बजे तक तृतीया प्राप्त है, जो रोहिणी नक्षत्र से संयुक्त है। 20 अप्रैल को सूर्योदयोपरांत 4 घण्टे 53 मिनट तृतीया मिल रही है, जिससे 20 अप्रैल को ही अक्षय तृतीया प्राप्त हो रही है।

पूर्व में संवत् 2019 सन् 1962 में ऐसी स्थिति प्राप्त होने पर सूर्योदयकाल में व्याप्त होने वाली परविद्धा रोहिणीयुता तृतीया में ही अक्षय तृतीया मनाई गई थी। तत्कालीन मोद मंदिर धर्मसभा जयपुर द्वारा यह निर्णय दिया गया था।

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श्रीसर्वेश्वर जयादित्य पंचांग 2083 सन् 2026-27

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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