इतिहास की घटनाओं से हमें सबक लेने का अवसर मिलता है, लेकिन दुर्भाग्य से कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इतिहास को नजरअंदाज कर गलतियों को पुनः दोहराते चले जाते हैं। कहानी 1856 के अवध की है, जहाँ नवाब वाजिद अली शाह के दो अमीर, मिर्जा सज्जाद अली और मीर रोशन अली, अंग्रेजों के आक्रमण से बेपरवाह होकर शतरंज खेलने में मशगूल थे। नतीजा ये हुआ कि उनकी सल्तनत अंग्रेजों के कब्जे में चली गई, और उन्हें होश तब आया जब अंग्रेज उन्हें गिरफ्तार कर चुके थे।
उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीति में भी ऐसा ही दृश्य उभरता हुआ प्रतीत हो रहा है। वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी ने मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल की। 224 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, लेकिन मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री पद अपने पुत्र अखिलेश यादव को सौंप दिया।
अखिलेश यादव ने मार्च 2012 में मुख्यमंत्री का पदभार संभाला। तब से उत्तर प्रदेश में तीन लोकसभा और दो विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं। इन पांच में से चार चुनाव अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी हार चुकी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद समाजवादी पार्टी ने अप्रत्याशित सफलता हासिल की, और अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ने 37 सीटें जीतीं, जो मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में भी कभी संभव नहीं हो पाया था।
राणा सांगा का अपमान अखिलेश को पड़ेगा भारी

इस विजय से अखिलेश यादव इस हद तक भ्रमित हो गए हैं कि उन्हें यह विश्वास हो गया है कि आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में जीत उनकी मुट्ठी में है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?
समाजवादी पार्टी के नेताओं द्वारा लगातार ऐसे बयान दिए जा रहे हैं जो न केवल राजनीतिक रूप से विवादित बल्कि समाजतोड़क भी हैं। पार्टी के कई नेता हिन्दू विरोधी बयान तो आए दिन देते ही रहते हैं; कभी औरंगजेब जैसे क्रूर आक्रांताओं की प्रशंसा करते हैं, तो कभी रामचरितमानस और हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करते हैं।
हाल ही में पार्टी सांसद रामजी लाल सुमन ने महाराणा सांगा जैसे महानायक को “गद्दार” कह दिया। इस बयान के खिलाफ करणी सेना ने खूब विरोध प्रदर्शन और हंगामा किया। लेकिन अखिलेश यादव इस गंभीर मुद्दे पर अपने सांसद को सीख देने की जगह उल्टा समर्थन कर रहे हैं, कम से कम पार्टी का पल्ला ही झाड़ लेते, इससे उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता की असलियत तो दिख ही गई है!
वास्तव में उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में योगी आदित्यनाथ का उभार जिस तेजी से हुआ है, उसका मुकाबला करने में अखिलेश यादव दूर दूर तक नजर नहीं आते। पिछले आठ वर्षों से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस प्रशासनिक कुशलता, लोकप्रियता और कार्यशैली का प्रदर्शन किया है, उसने समाजवादी पार्टी के जनाधार को लगातार सीमित ही किया है।
हाल ही में हुए विधानसभा उपचुनाव में ये स्पष्ट हो गया। मुस्लिम बहुल क्षेत्र कुंदरकी, जहाँ लगभग 65% मुस्लिम मतदाता हैं, वहाँ भी समाजवादी पार्टी हार गई और भाजपा के उम्मीदवार ने शानदार विजय हासिल की। यह स्थिति अखिलेश यादव के नेतृत्व की विफलता का स्पष्ट प्रमाण है।
क्या 2027 में अखिलेश जीतेंगे?

सत्ता का सपना देखना राजनीतिक में सामान्य है, परन्तु राजनीतिक वास्तविकता से कटकर मात्र अहंकार में जीना विनाशकारी साबित होगा। लोकसभा चुनाव में 37 सीटों की विजय बड़ी जरूर है, पर इसका यह मतलब नहीं कि विधानसभा चुनाव में जीत स्वतः सुनिश्चित हो गई हो। जनता ऐतिहासिक नायकों और सांस्कृतिक प्रतीकों के अपमान को कभी नहीं भूलती।
कांग्रेस की वर्तमान रणनीति भी इस मुद्दे पर चुप्पी के कारण उसे राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुँचा सकती है, विशेषकर राजस्थान जैसे राज्यों में, जहाँ सांस्कृतिक नायकों का सम्मान राजनीति से भी ऊपर है।
अखिलेश यादव को यह समझना चाहिए कि राजनीति केवल सीटों की संख्या से नहीं होती, बल्कि हर वर्ग के साथ आत्मीय जुड़ाव पर निर्भर करती है। योगी आदित्यनाथ की तुलना में अखिलेश यादव की राजनीतिक सक्रियता, संवाद और जनसम्पर्क में भारी कमी स्पष्ट दिखाई देती है। योगी आदित्यनाथ अपनी मजबूत स्थिति के बावजूद निरंतर जनता के बीच सक्रिय बने हुए हैं, जबकि अखिलेश यादव लोकसभा की 37 सीटों की विजय के घमंड में निश्चिंत बैठे प्रतीत हो रहे हैं।
अखिलेश यादव की राजनीतिक शैली मुख्यतः विरोधियों की खिल्ली उड़ाने तक रह गई है, चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, गृह मंत्री अमित शाह हों या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। इस शैली का परिणाम 2022 के विधानसभा चुनाव में स्पष्ट देखा जा चुका है, जहाँ जनता ने सपा को नकार दिया था। यदि यही रवैया अखिलेश यादव का रहा तो 2027 के विधानसभा चुनाव में परिणाम 2017 से भी खराब हो सकते हैं।
राणा सांगा का अपमान पड़ेगा भारी
राणा सांगा मुद्दे पर अखिलेश यादव ने जैसा आचरण किया है, उससे केवल राजपूत ही नहीं, बहुत सी जातियां उन्हें माफ़ नहीं करेंगी। राणा सांगा किसी जातिविशेष के ही महापुरुष नहीं हैं, बल्कि पूरे देश के महापुरुष हैं, ऐसे महापुरुष को गद्दार कहना और उसपर राजनीतिक रोटियां सेकना सपा को भारी पड़ेगा।
क्षत्रिय समाज के खिलाफ ऐसा ही एक विवादास्पद बयान 2024 में गुजरात से बीजेपी के उम्मीदवार पुरुषोत्तम रुपाला ने दिया था, जिसका खासा खामियाजा बीजेपी को उठाना पड़ा था, लोकसभा में कम से कम 10 सीटों का नुकसान तो केवल यूपी में ही उठाना पड़ा था। जबकि पुरुषोत्तम रुपाला ने कई बार माफी मांगी थी।
अब अखिलेश यादव जान लें कि राणा सांगा से बदतमीजी का दुष्परिणाम सपा को भुगतना होगा। जिसे वे दलित बनाम सवर्ण की लड़ाई बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वह उन्हें उलटी पड़ेगी। दलित समाज भी राणा सांगा को देश का महापुरुष ही मानता है, दलितों के पास कोई कारण नहीं है कि वे व्यर्थ में राणा सांगा का विरोध कर अखिलेश यादव का चारा बनें। सांगा प्रकरण में अखिलेश यादव को समय रहते इतिहास से सबक ले लेना चाहिए, जनता की भावनाओं को समझकर सही राजनीतिक रास्ता चुनें। अन्यथा इतिहास एक बार फिर वही दोहराएगा, जो अवध के नवाबों के साथ हुआ था, और तब पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचेगा।
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