Thursday, January 29, 2026

मणिकर्णिका घाट निर्माण के समय लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर का भी हुआ था भयंकर विरोध

मणिकर्णिका घाट

मणिकर्णिका घाट पर अभी जो नवीनीकरण कार्य चल रहा है इसे लेकर भयंकर विवाद छिड़ गया है और गंगा के समान पवित्र राजमाता अहिल्याबाई होल्कर का नाम लेकर सरकार से लेकर प्रधानमंत्री तक की बुराई की जा रही है।

अहिल्याबाई होल्कर द्वारा मणिकर्णिका घाट निर्माण का काशी में हुआ था भयंकर विरोध

पर आज जो बर्ताव प्रधानमंत्री से किया जा रहा है अतीत में ऐसा ही बर्ताव मातेश्वरी अहिल्याबाई होल्कर के साथ किया गया था। यह खुद होल्कर राज्य के अभिलेखों में दर्ज वह स्याह सच्चाई है जिसे सुनकर उनके नाम पर प्रोपेगेंडा कर रहे लोगों की जड़ें हिल जाएंगी।

होल्कर राजघराने द्वारा प्रकाशित होल्कर स्टेट हिस्ट्री के द्वितीय खण्ड में वासुदेव वी. ठाकुर द्वारा संपादित ‘लाइफ एंड लाइफ वर्क्स ऑफ देवी श्री अहिल्याबाई होल्कर’ जिसमें मातेश्वरी के सभी पत्र, दस्तावेज व जीवनगाथा यथावत दी गयी है, जो मातेश्वरी के जीवन का एकमात्र प्रामाणिक और प्राथमिक स्रोत है, उसी में यह स्पष्ट दर्ज है कि वाराणसी में इसी मणिकर्णिका घाट व श्रीकाशीविश्वनाथ मंदिर आदि के निर्माण के समय मातेश्वरी को काशीवासियों के भयंकर विरोध का सामना करना पड़ा था व अपने पराक्रम से ही वे उसमें सफल हो सकी थीं।

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Thakur, Vasudeo V. Life and Life’s-Work of Shree Devi Ahilya Bai Holkar. Indore, n.p., n.d., p. 51.

बालाजी लक्ष्मण का माता अहिल्याबाई को लिखा पत्र

मातेश्वरी द्वारा काशी में नियुक्त अधिकारी बालाजी लक्ष्मण ने अपने पत्र में काशी के कुछ लोगों द्वारा मणिकर्णिका घाट के निर्माण में दुर्भावना, ईर्ष्या और झगड़े खड़े करने का उल्लेख किया है, देखें यथावत हिन्दी अनुवाद, अंग्रेजी अभिलेख संलग्न,

(राज्य-अभिलेख)

“बालाजी लक्ष्मण, श्रीमान महाराजा, मातृवत् अहिल्या बाई (बाई साहेबा) की सेवा में आज्ञाकारी सेवक, की ओर से शुभकामनाओं सहित निवेदन। आपके कृपालु संरक्षण में पवित्र बनारस धाम में हम कुशल हैं। इस पवित्र नगरी में पंचगंगा आदि अनेक घाट हैं; परन्तु श्री मणिकर्णिका घाट और श्री तारकेश्वर का जो कार्य आपकी उच्चता ने कराया है, वह आपकी कीर्ति के अनुरूप उतना ही अद्भुत बन गया है। मणिकर्णिका का स्थान नगर में भी और पुराणों में भी प्रथम और सर्वोपरि है; ईश्वर की इच्छा थी कि वहाँ का कार्य केवल आपका ही हो, और आपकी शाश्वत कीर्ति के लिए वैसा ही हुआ है।

काशी नगर दुर्भाव, ईर्ष्या और झगड़ों से भरा है; और इस दुर्दशा में वृद्धि करने के लिए गंगा के पुत्र सब के सब अत्यन्त बलवान पुरुष हैं। वास्तव में आपके महान और शुभ भाग्य ने ही उस कार्य को पूरा करवाया! पंचगंगा पर एक भारतीय बैंड सेवा में है। मणिकर्णिका घाट पर भी एक भारतीय बैंड और एक पहरेदार रखना आपकी उच्चता की महिमा में वृद्धि करेगा।”

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इस प्रकार बालाजी लक्ष्मण स्पष्ट कह रहे हैं कि मणिकर्णिका घाट के निर्माण में काशी के कुछ लोग दुर्भावना से भरे हैं, ईर्ष्या से भरे हैं और झगड़ा फसाद करके कार्य में रोड़े अटका रहे हैं, व वे सब अत्यंत बलवान, रसूखदार हैं इसलिए दुर्दशा में वृद्धि कर रहे हैं।

अंत में यह अधिकारी कह रहा है कि, मणिकर्णिका घाट का निर्माण केवल और केवल मातेश्वरी अहिल्याबाई के प्रबल भाग्य से ही सम्भव हुआ है, अर्थात्? अन्यथा यह कैसे भी सम्भव न था! सोचिए यह अधिकारी कितना अधिक त्रस्त किया गया होगा तब इतनी स्पष्ट बात इसे पत्र में लिखनी पड़ रही है, लगभग पस्त होकर ही ऐसा शब्दचयन बालाजी लक्ष्मण ने किया है।

जब मातेश्वरी अहिल्याबाई होल्कर को मणिकर्णिका घाट के निर्माण के लिए इतना विरोध सहना पड़ा तो आज नरेन्द्र मोदी को भी वैसा विरोध सहना पड़े तो इसमें क्या बड़ी बात है ? समकालीन जनता का ऐसा ही स्वभाव अनादिकाल से रहा है। वह प्रायः ही यथास्थितिवादी या फिर विकास विरोधी ही होती है। यही जनता 150-200 साल बाद उसी शासक को याद करती है।

उसे स्वयं किसी सुधार में कोई सहभागिता नहीं निभानी होती, पर शिकायतों का तो उसके पास अंबार होता है। पर कोई शिकायतों का निस्तारण करता हो तो वह उसे परंपरा द्रोही, धर्म द्रोही करार दे देती है।

असंवेदनशील कार्यवाही के अधिकारी हैं दोषी

यदि इस मामले में कोई दोषी है तो वह केवल अधिकारी ही हैं, जिन्हें सुरक्षित रूप से मूर्तियां संगृहीत कर लेनी चाहिए थीं, बजाय ऐसे बेतरतीब कार्य करने के। गैर जिम्मेदारपना ही इन अधिकारियों की नियति है, 9 से 5 ड्यूटी ही तो करनी है कौन इतना दिमाग लगाए वाली मानसिकता है। अब मूर्ति को पुनर्स्थापित करने की बात कह रहे हैं तो पहले से ही ठीक से पुनर्स्थापन की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई।

संपूर्ण जीर्णोद्धार का विरोध करने वाले विकास विरोधी

पर अधिकांश विरोध करने वालों को तो पूरे जीर्णोद्धार कार्य से ही चिढ़ है, मूर्तियां सिर्फ एक बहाना है। बजबजाते हुए नाले जिन्हें पसन्द आ रहे हैं वही बाबा विश्वनाथ धाम जैसे दिव्यतम मंदिर को मॉल कह सकेगा। जो कभी काशी में जाकर बाबा का दर्शन नहीं किया वह ही विश्वनाथ कॉरिडोर को कंक्रीट का जंगल कह सकेगा। जो गया है वही उस कॉरिडोर के कण कण की दिव्यता को महसूस कर सकेगा।

एक बार बाबा के पास पहुंच जाओ, फिर चारों ओर बने सुंदर गलियारे में घण्टों बैठकर जप करो, जहां मधुर शास्त्रीय संगीत बजता है, वेदपाठ होता है, तिलक लगता है, वहां बैठकर ऐसा लगता है जैसे बाबा पास बैठे हैं, उस दिव्य वातावरण को वहां जाकर स्वयं ही अनुभव किया जा सकता है। जिन्हें ऐसा स्वच्छ सुंदर भव्य दिव्य निर्मल कॉरिडोर गन्दा लगता है, तो क्या उन्हें नाली में बैठना अच्छा लगता है?

मोदी का राजनीतिक विरोध है असली कारण

जिन अहिल्याबाई होल्कर ने स्वयं मणिकर्णिका घाट के निर्माण पर भयंकर विरोध झेला, आज उसी घाट के नवनिर्माण पर उनके नाम पर मोदी का अंधविरोध हो रहा है।

मातेश्वरी भी शिवलोक से यह देख आश्चर्य कर रही होंगी। आज से 250 साल बाद फिर से मणिकर्णिका घाट का पुनर्निर्माण होगा, तब भी कोई हिन्दू शासक इतिहास के मोदी के नाम पर विरोध झेलेगा। घाट तो सदैव रहेगा, राजा बदलते रहेंगे।

PM नरेन्द्र मोदी ने दिया लोकमाता अहिल्याबाई को सर्वाधिक सम्मान

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उससे भी ज्यादा यह सब राजनीतिक विरोध है, उस मोदी को यह धूर्त लोदी, महमूद, औरंगजेब कह रहे हैं जिस मोदी ने काशी को इतना सँवारा। उसे अहिल्याबाई का विरोधी कह रहे हैं जिसने पहली बार उन्हें इतने बृहद स्तर पर सम्मानित किया, पूरे देश में मातेश्वरी अहिल्याबाई होल्कर का त्रिशती वर्ष मनाया।

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मोदी ने सदैव मातेश्वरी को भगवती मानकर पूजा है। ये PM मोदी ही थे जिन्होंने बाबा विश्वनाथ के प्रांगण में माता अहिल्याबाई की मूर्ति स्थापित की थी। यह मोदी ही थे जिन्होंने गत 31 मई 2025 को यह मोदी ही थे जिन्होंने देश के कोने कोने में माता अहिल्याबाई के कार्यों का प्रचार किया और 300वीं जयन्ती राष्ट्रीय व सरकारी स्तर पर मनाई। उस मोदी को कोई धूर्त ही लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर का विरोधी कह सकता है।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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