Thursday, January 29, 2026

दरगाह : यहाँ हिन्दू माथा टेकते हैं या अस्तित्व का सरेंडर करते हैं ?

वर्तमान में भारत की जनसंख्या में करीब 100 करोड़ लोग हिन्दू हैं, और यह मान्यता है कि हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी-देवता हैं। अगर हिन्दू जनसंख्या और देवताओं की संख्या के बीच तुलना करें, तो हर तीन से चार हिन्दुओं के लिए एक व्यक्तिगत देवता उपलब्ध हो सकता है।

पर आश्चर्य तब होता है, जब कई हिन्दू अन्य धर्मों के पूजास्थलों जैसे पीर, मजार, चर्च और दरगाहों पर दिखाई देते हैं। इनमें से कई दरगाहें उन लोगों के लिए बनाई गई हैं, जिनका इतिहास हिन्दू हितों के खिलाफ हिंसक और आक्रामक रहा है। आइए, ऐसी कुछ दरगाहों के बारे में जानें, जहाँ हिन्दू सिर झुका रहे हैं या अपने अस्तित्व को समर्पित कर रहे हैं, यह समझना मुश्किल हो जाता है।

सालार मसूद की दरगाह, बहराइच

सभी जानते हैं कि श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पर महमूद गजनवी ने हमला किया था, लेकिन इसके पीछे का असली सूत्रधार कौन था? वह था गजनवी का भतीजा सालार मसूद! इन दोनों ने मिलकर सोमनाथ सहित कई हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त किया और हिन्दुओं पर अनगिनत जुल्म ढाए। जब सालार मसूद ने बहराइच पर हमला किया, तब वहाँ राजा सुहेलदेव का शासन था। राजा सुहेलदेव ने सालार मसूद और उसकी सेना को करारी शिकस्त दी और उसे नरक का रास्ता दिखाया।

सालार मसूद दरगाह Dargaah

अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के इतिहासकार मान जी ने अपने प्राथमिक स्रोतों पर आधारित शोध में खुलासा किया कि सालार मसूद ने बहराइच में एक तालाब के पास बने प्राचीन सूर्य मंदिर के पास अपना शिविर लगाया था। यही जगह अब उसकी दरगाह है, जहाँ उसे मरने के बाद दफनाया गया और बाद में इसे दरगाह का रूप दे दिया गया।

सालार मसूद दरगाह Dargaah raja suheldev

हैरानी की बात यह है कि यहाँ के हिन्दू उसे ‘बारे पीर’ या ‘हठीले पीर’ कहकर पूजते हैं और उर्स में आटे के घोड़े प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं। मसूद के साथी लाल पीर और उसके पिता बिरधा बाबा की भी कन्नौज आदि में उर्स मनाए जाते हैं और उनकी पूजा होती है। हिन्दू अपने पूर्वजों के हत्यारे सालार मसूद की पूजा कैसे और क्यों करते हैं, यह सवाल कई अंग्रेजों को भी हैरान करता था। शायद हिन्दुओं को खुद इस पर आश्चर्य नहीं होता।

बख्तियार खिलजी की कब्र, बंगाल

बख्तियार खिलजी वह पहला मुस्लिम शासक था, जिसने बिहार पर विजय हासिल की थी। 12वीं सदी में उसने नालन्दा विश्वविद्यालय पर हमला करके उसे तबाह कर दिया था। बख्तियार खिलजी के चाचा का वाराणसी के आसपास के कुछ इलाकों पर कब्जा था, और बख्तियार ने इसका लाभ उठाकर बिहार पर बार-बार आक्रमण किए, क्योंकि वहाँ कोई शक्तिशाली हिन्दू शासक नहीं था।

सालार मसूद दरगाह Dargaah bakhtiyar khilji

इसी समय उसने नालन्दा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों को नष्ट किया, हिन्दू और बौद्ध विद्वानों को जिंदा जलाया, और वहाँ के पुस्तकालयों में आग लगा दी, जिससे हिन्दुओं का विशाल ज्ञान भंडार नष्ट हो गया। इसके बाद 1204 ईस्वी के आसपास उसने बंगाल के सेन राजाओं की राजधानी ‘नदिया’ पर हमला करके कब्जा कर लिया और राजा की पत्नी व बच्चों को गुलाम बना लिया।

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हिन्दुओं पर भयानक अत्याचार करने के बाद उसने 10 हजार घुड़सवारों की फौज के साथ असम पर हमला किया, लेकिन असम के माघ शासकों ने चतुराई से उसे हरा दिया। इसके बाद वह बंगाल तक सीमित हो गया, और उसके ही असंतुष्ट साथियों ने धोखे से उसकी हत्या कर दी।

सालार मसूद दरगाह Dargaah

आज पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर जिले के गंगारामपुर ब्लॉक में पीरपाल गाँव में बख्तियार खिलजी की कब्र है। मरने के बाद उसे पीर का दर्जा देकर पूजा जाने लगा, और हैरानी की बात यह है कि इस गाँव के कई हिन्दू उसके सम्मान में आज भी जमीन पर सोते हैं।

फतहशाह तुगलक की दरगाह, दिल्ली

दिल्ली में फिरोजशाह तुगलक के बेटे फतहशाह तुगलक की कब्र है, जिसे दरगाह कदम शरीफ कहते हैं। फिरोजशाह तुगलक वही शासक था, जिसने 1360 ईस्वी में उड़ीसा के जाजनगर पर हमला करके भानुदेव तृतीय को हराया और पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर को नष्ट कर दिया था। एक साल बाद उसने नगरकोट पर भी आक्रमण किया।

फिरोजशाह इतना कट्टर सुन्नी मुस्लिम था कि उसने मुस्लिम अपराधियों को मृत्युदंड देना बंद कर दिया था। उसने हिन्दुओं को ‘जिम्मी’ घोषित किया और जजिया कर लगाकर उन पर भयंकर अत्याचार किए। इतिहासकार आर.सी. मजूमदार कहते हैं कि ‘फिरोज अपने समय का सबसे कट्टर शासक था और इस मामले में सिकंदर लोदी व औरंगजेब का अग्रदूत था।’

इसके बेटे की कब्र, दरगाह कदम शरीफ, पर आज भी पढ़े-लिखे हिन्दू सिर झुकाने और नाक रगड़ने जाते हैं। क्या उन्हें जगन्नाथ मंदिर को तोड़े जाने का जरा भी दुख नहीं है?

पावागढ़ की दरगाह से मुक्ति

सालार मसूद दरगाह Dargaah

गुजरात के बड़ोदा शहर से 30 किलोमीटर दूर पावागढ़ की पहाड़ी पर माँ कालिका का एक प्राचीन शक्तिपीठ है। 15वीं सदी में मुस्लिम शासक मुहम्मद बेगड़ा ने इस शक्तिपीठ के शिखर को तोड़कर हिन्दुओं का अपमान करने के लिए वहाँ एक दरगाह बनवा दी थी। इस वजह से 500 साल तक मंदिर का शिखर नहीं रहा और वहाँ ध्वजा नहीं फहराई जा सकी।

सालार मसूद दरगाह Dargaah

नीचे माँ काली का मंदिर और ऊपर शिखर पर तीन फीट की दरगाह! फिर भी भोले-भाले हिन्दू उस हरी दरगाह पर इतने सालों तक पैसे और फूल चढ़ाते रहे। लेकिन 500 साल बाद, जून 2022 में, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में मंदिर के शिखर से मजार हटाकर नया शिखर बनाया गया और पूरे मंदिर क्षेत्र का विकास किया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री ने खुद शिखर पर पहली बार ध्वजा चढ़ाई और इस क्रूर इतिहास का अंत हुआ।

सालार मसूद दरगाह Dargaah पावागढ़

आज भी न जाने कितने मंदिर ऐसे ही प्रयासों की प्रतीक्षा में हैं कि कब उन्हें औपनिवेशिकता से मुक्ति मिलेगी और उनका असली स्वरूप सामने आएगा। यह तभी संभव होगा, जब हिन्दू अपने विवेक का इस्तेमाल करेंगे।

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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