1925 और भारतीय राजनीति की दो दिशाएँ
1925 भारतीय राजनीति के लिए केवल एक ऐतिहासिक वर्ष नहीं था, बल्कि दो अलग अलग बौद्धिक यात्राओं का आरंभ था। इसी वर्ष कुछ ही महीनों के अंतराल पर दो ऐसे संगठन अस्तित्व में आए जिन्होंने समाज सत्ता और परिवर्तन को देखने की बिल्कुल भिन्न दृष्टि अपनाई।
27 सितंबर 1925 को नागपुर में की स्थापना हुई और ठीक तीन महीने बाद 26 दिसंबर 1925 को कानपुर में का गठन हुआ। दोनों का घोषित उद्देश्य भारत को बदलना था लेकिन दोनों की शुरुआती समझ अलग थी। एक ने माना कि समाज को गढ़े बिना सत्ता अर्थहीन है जबकि दूसरे ने माना कि सत्ता बदलेगी तो समाज अपने आप बदल जाएगा।
समाज पहले राजनीति बाद में
संघ की सोच शुरू से इस बिंदु पर केंद्रित रही कि राजनीति समाज का परिणाम होती है उसका विकल्प नहीं। अनुशासन स्मृति सांस्कृतिक निरंतरता रोजमर्रा की आदतें और सामूहिक जीवन की लय इन सबको उसने राजनीति से पहले साधने योग्य माना। यही कारण था कि संघ ने लंबे समय तक चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखी।
उसका लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना नहीं बल्कि समाज में ऐसी स्थायी उपस्थिति बनाना था जो किसी अभियान या घोषणा पर निर्भर न हो। शाखा उत्सव सेवा कार्य प्रतीक और इतिहास बोध को उसने सामाजिक जीवन के स्वाभाविक अंग के रूप में विकसित किया न कि राजनीतिक औजार के रूप में।
सत्ता से समाज को बदलने की कोशिश
इसके ठीक उलट कम्युनिस्ट आंदोलन इस विश्वास के साथ आगे बढ़ा कि आर्थिक संरचना में परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन की कुंजी है। वर्ग संघर्ष भूमि सुधार और राज्य के माध्यम से संसाधनों का पुनर्वितरण यही उसके मुख्य उपकरण रहे।

इस दृष्टि में धर्म परंपरा और सांस्कृतिक स्मृति को अक्सर ऐसी विरासत माना गया जिसे समय के साथ अप्रासंगिक हो जाना था। यह सोच वैचारिक रूप से अनुशासित और प्रशासनिक रूप से प्रभावी अवश्य थी लेकिन इसमें समाज को भीतर से समझने के बजाय ऊपर से ढालने की प्रवृत्ति निहित रही।
केरल मॉडल की चमक और उसकी सीमाएँ
स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक ऐसा प्रतीत हुआ कि कम्युनिस्ट प्रयोग विशेष रूप से केरल में सफल रहा है। साक्षरता स्वास्थ्य भूमि सुधार और स्थानीय शासन के क्षेत्र में केरल मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। के नेतृत्व में बने इस ढांचे को लंबे समय तक एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया।
लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट होने लगा कि ये उपलब्धियाँ प्रारंभिक लाभ थीं जिनकी कीमत भविष्य में चुकानी थी। शिक्षा का विस्तार हुआ लेकिन उसके अनुरूप उत्पादन और रोजगार के अवसर नहीं बने। कल्याणकारी योजनाएँ बढ़ीं लेकिन आर्थिक गतिशीलता ठहरती चली गई। शासन चलता रहा लेकिन संस्थाएँ धीरे धीरे थकान और जड़ता का शिकार होती गईं।
जब शासन संस्कृति का स्थान लेने लगे
यहीं से मूल समस्या उभरती है। वामपंथ यह मानकर चलता रहा कि शासन संस्कृति का स्थान ले सकता है। जब तक प्रशासन प्रभावी रहा यह कमी छिपी रही। लेकिन जैसे ही शासन प्रक्रियात्मक और थका हुआ दिखने लगा उसकी वैधता पर सवाल उठने लगे।
आलोचना की भाषा तो बनी रही लेकिन अपनत्व आस्था और स्मृति की भाषा राजनीति से बाहर होती चली गई। जब राजनीति समाज की रोजमर्रा की अनुभूति से कट जाती है तो उसका क्षरण अपरिहार्य हो जाता है।
केरल में बदलते राजनीतिक संकेत
इसी पृष्ठभूमि में केरल में की बढ़ती स्थानीय उपस्थिति को समझना आवश्यक है। यह कोई अचानक हुआ वैचारिक परिवर्तन नहीं है और न ही यह किसी तात्कालिक असंतोष का परिणाम है। यह उस दीर्घ सांस्कृतिक प्रक्रिया का राजनीतिक रूप है जो दशकों से समाज के भीतर कार्यरत थी।
स्थानीय निकाय चुनाव विचारधाराओं से कम और भरोसे परिचय तथा सामाजिक संगति से अधिक तय होते हैं। वहाँ नीतिगत घोषणाएँ नहीं बल्कि रोजमर्रा की विश्वसनीय उपस्थिति निर्णायक होती है।
परंपरा को नकारना और परंपरा में संगठित होना
भारतीय कम्युनिज्म ने समाज से अपेक्षा की कि वह अपने अतीत से बाहर निकले। संघ परंपरा ने समाज को अपने अतीत के भीतर संगठित होने का आग्रह किया। एक ने परंपरा को बाधा माना जबकि दूसरे ने उसे राजनीति की पूर्वशर्त समझा। भारत जैसी सभ्यता में जहाँ संस्कृति शासन से पहले आती है और पहचान नीति से पहले यह अंतर समय के साथ निर्णायक बनना ही था।
भ्रम का अंत और नए प्रश्न की शुरुआत
आज केरल किसी महान प्रयोग के अचानक पतन को नहीं देख रहा। वह उस लंबे भ्रम के अंत को देख रहा है जिसमें यह मान लिया गया था कि प्रशासन अनंत काल तक वैधता का बोझ ढो सकता है।
राजनीतिक प्रश्न अब यह नहीं है कि किसने कभी बेहतर शासन किया था। प्रश्न यह है कि वर्तमान समय में कौन समाज को संगति दिशा और आत्मविश्वास दे पा रहा है। और इस प्रश्न की जड़ें चाहे स्वीकार की जाएँ या नहीं 1925 में ही रोप दी गई थीं।

